वेद क्या हैं ? वेदों का महत्व

वेद क्या हैं ? वेदों का महत्व

वेद क्या है ?

वेद क्या हैं ? वेदों का महत्व

हिन्दू सभ्यता के सबसे प्राचीन ग्रंथों को वेद कहा गया है। वेद संस्कृत के शब्द विद् से बना है, जिसका अर्थ होता है जानना। वेद ईश्वर द्वारा ऋषियों को सुनाए गए ज्ञान पर आधारित है इसीलिए इसे श्रुति कहा गया है, बहुत लम्बे समय तक जब लिपिक कला विकसित नहीं हुई थी, तब यह श्रुति के रूप में प्रचलित थे। वेदों में परम सत्य ईश्वर की वाणी संगृहीत की गई है । ब्रह्म क्या है ? जीव क्या है ? आत्मा क्या है ? ब्रह्मांण्ड की उत्पत्ति कैसे हुई है ? ज्योतिष, गणित, रसायन, औषधि, प्रकृति, खगोल, भूगोल, धार्मिक नियम, इन सभी बिंन्दुओं पर विस्त्रित व्याख्या हमारे वेदों में भरी पडी़ है। सम्पूर्ण पिण्ड-ब्रह्माण्ड और परमात्मा को जानने का विज्ञान ही वेद है। वेद मानव सभ्यता, भारतीय संस्कृति के मूल श्रोत हैं। इनमें मानव-जीवन के लौकिक एवं पारलौकिक उन्नति के लिये उपयोगी सभी सिद्धान्तों एवं उपदेशों का अद्भुत वर्णन है। वेद एक प्रकार से मंत्र का विज्ञान है, जिसमें विराट् विश्व ब्रह्मांड की अलौकिक शूक्ष्म एवं चेतन सत्ताओं एवं शक्तियों तक से सम्बन्ध स्थापित करने करने के गूढ़ रहस्य दिये हुये है। भौतिक विज्ञानी अभी तक इस क्षेत्र में मामुली सी जानकारी ही प्राप्त कर सके हैं। वेदों में आध्यात्मिक ज्ञान के साथ-साथ विज्ञान, कला , संगीत और आयुर्वेद का ज्ञान भी है। सारे वेद संस्कृत भाषा में रचित हैं। वेदो को  चार भागो में बांटा गया है।

१ – ऋग्वेद –

ऋक अर्थात् स्थिति और ज्ञान। ऋग्वेद सबसे पहला वेद है जो पद्यात्मक है। यह सबसे प्राचीनतम वेद हैइसमें 10 मण्डल तथा 1,028 सूक्त और 11000 मन्त्रों का वर्णन मिलता है। गायत्री मन्त्र का उल्लेख भी ऋग्वेद मे ही है। ऋग्वेद  के मंत्रो को उच्चरित करने वाले ऋषियों को होतृ कहा जाता है। इस वेद की 5 शाखाएं हैं – शाकल्प, वास्कल, अश्वलायन, शांखायन, मंडूकायन। इसमें भौगोलिक स्थिति और देवताओं के आवाहन के मंत्रों के साथ बहुत कुछ है। ऋग्वेद की ऋचाओं में देवताओं की प्रार्थना, स्तुतियां और देवलोक में उनकी स्थिति का वर्णन है। ऋग्वेद का पहला व दसवां मंडल सबसे अंत में जोड़ा गया तथा दूसरे मंडल से लेकर नौंवे मंडल तक सभी मंडल प्राचीन हैं। ऋग्वेद के आठवें मंडल की हस्तलिखित ऋचाओं को खिल कहा जाता है।

२ – यजुर्वेद –

यजु का अर्थ होता है यज्ञ इसलिए यजुर्वेद में यज्ञ ( हवन) करने की सभी विधियाँ और यज्ञ से जुड़े सभी मन्त्रों का उल्लेख मिलता है। यज्ञ के अलावा तत्वज्ञान, रहस्यमयी ज्ञान, ब्रह्माण, आत्मा, ईश्वर और पदार्थ का ज्ञान का भी वर्णन है। यजुर्वेद के मंत्रो को उच्चरित करने वाले पुरोहितो को अध्वुर्य कहा जाता है।  यजुर्वेद ही एकमात्र ऐसा वेद हो जो गद्य और पद्य दोनों में लिखा गया है। यजुर्वेद के दो भाग हैं कृष्ण और शुक्ल।

कृष्ण :वैशम्पायन ऋषि का सम्बन्ध कृष्ण से है। कृष्ण की चार शाखाएं हैं।
शुक्ल : याज्ञवल्क्य ऋषि का सम्बन्ध शुक्ल से है। शुक्ल की दो शाखाएं हैं। इसमें 40 अध्याय हैं। यजुर्वेद के एक मंत्र में च्ब्रीहिधान्यों का वर्णन प्राप्त होता है। इसके अलावा, दिव्य वैद्य और कृषि विज्ञान का भी विषय इसमें मौजूद है।

३ – सामवेद –

साम का अर्थ होता है गान ( गायन )। इसीलिए भारतीय संगीत का मूल आधार सामवेद को माना गया है। जो व्यक्ति भारतीय शास्त्रीय संगीत को सुनते होंगे या जानते होंगे उनको  इसकी महत्वता पता होगी कि यह संगीत कितना सुखदाई और आनंददाई होता है। मैडिटेशन और शांति के लिए पूरी दुनिया शास्त्रीय संगीत का उपयोग करती है। 1875 मंत्रों के इस वेद में 75 मंत्रों को छोड़कर शेष सब मंत्र ऋग्वेद से ही लिए गए हैं जो गीतात्मक यानी गीत के रूप में है। सामवेद के पाठ्यकर्ता को उद्रातृ कहा जाता है। इसकी 1001 शाखाएं थीं। परन्तु आजकल तीन ही प्रचलित हैं – कोथुमीय, जैमिनीय और राणायनीय।

४ – अथर्ववेद –

अथर्व वेद की रचना अथर्व ऋषि ने की थी। अथर्ववेद की भाषा और स्वरूप के आधार पर ऐसा माना जाता है कि इस वेद की रचना सबसे बाद में हुई थी। यज्ञों व देवों को अनदेखा करने के कारण वैदिक पुरोहित वर्ग इसे अन्य तीन वेदों के बराबर नहीं मानता था। इसे यह दर्जा बहुत बाद में मिला। क्योंकि यह वेद एक ऋषि द्वारा रचित है और कुछ बाते खरी उतरती हैं और कुछ नहीं इसलिए इस वेद को वेदो में रखने पर अभी भी वाद विवाद चलता रहता है। अथर्ववेद में कुल 20 काण्ड, 730 सूक्त एवं 5987 मंत्र हैं। जिनमे ब्रह्मज्ञान औषधि प्रयोग रोग निवारण जन्त्र-तन्त्र टोना-टोटका आदि का विस्तृत वर्णन मिलता है।

तो अपने देखा की हमारे वेदो में सभी चीजों का वर्णन भरपूर है। जो तर्क की कसौटी पर भी खरे उतरते हैं। वो तो हम भारतीयों की अज्ञानता है की हम वेदो के महत्व को समझने का प्रयास नहीं कर रहे हैं एक बार भारत फिर से वैदिक सिद्धांतो के अनुसार चलने लग जाये तो फिर से सोने की चिड़िया बन जायेगा। लेकिन विडंबना यह है की आज के मॉडर्न युवा और युवतियों को अपने फैशन से फुर्सत ही कहाँ मिलती है, विदेशी और गन्दी परम्पराओं को भारत में लाने से फुर्सत ही कहाँ मिलती है। खैर।

आपको यह जानकर अति प्रसन्नता होगी कि 7 नवंबर 2003 को The United Nations Educational, Scientific and Cultural Organization ( UNESCO ) द्वारा वेदों को मानवता के मौखिक एवं अमूर्त विरासत की श्रेष्ट कृति घोषित किया जा चुका है। वेद दुनियां के सबसे पहले ग्रन्थ के साथ साथ ऐसे ग्रन्थ भी हैं जिनपर आजतक किसी भी व्यक्ति ने सवाल खड़ा नहीं किया, क्योंकि वेदो में लिखी हर बात तर्क और विज्ञान की कसौटी पर खरी उतरती है। और इसलिए भारत ज्ञान के मामले में दुनिया का गुरु माना जाता है।

वेदों का महत्व –

वेद की भारतीय धर्म में इतनी प्रतिष्ठ है कि -कोई विद्वान तर्क द्वारा किसी भी विषय को सिद्ध कर दे, पर यदि वह वेद विरुद्ध जान पड़ेगा तो उनको उसके सामने सर झुकाना पड़ेगा। हमारे अधिकाँश भाई ईश्वर को नहीं मानते उनको ‘आस्तिकता’ से विहीन नहीं कहा जाता, पर जो वेद की प्रामाणिकता को अस्वीकार करते हैं उनको निश्चित रूप में ‘नास्तिक’ की पदवी दे दी जाती है। इस प्रकार वेदों का महत्व हिंदू धर्म में सबसे अधिक है। ‘शतपथ ब्राह्मण’ में स्पष्ट लिखा है कि धन से भरी हुई पृथ्वी के दान से जितना पुण्य होता है, तीन वेदों के अध्ययन करने से उससे अधिक पुण्य मिलता है।

मनु भगवान ने वेद के जानने वाले विद्वान की प्रशंसा करते हुए कहा है कि “वेद शास्त्र तत्व को जानने वाला व्यक्ति किसी भी आश्रम में रहे, वह इसी लोक में रहते हुए ब्रह्म का साक्षात्कार करता है।”

इस विवेचन से ज्ञात होता है कि यदि हम भारतीय धर्म के वास्तविक स्वरूप का ज्ञान प्राप्त करना चाहते हैं तो हमको वेदों का अनुशीलन करना आवश्यक है। मनु ने वेद का अध्ययन न करने वाले ब्राह्मण की बड़ी निंदा की है और कहा है कि जो ब्राह्मण वेद का अध्ययन किये बिना अन्य शास्त्रों को पढ़ने में परिश्रम करता है वह अपने वंश सहित शूद्र के दर्जे को पहुँच जाता है। द्विज का द्विजत्व तभी सार्थक हो सकता है जब वह गुरु से दीक्षा लेकर वेदों का अध्ययन करे।

इसलिए हम कह सकते हैं कि वेद का अनुशीलन प्रत्येक हिंदू का कर्तव्य है क्योंकि इसके बिना वे अपने धर्म और संस्कृति के असली तत्वों की जानकारी प्राप्त नहीं कर सकते। परंतु आजकल लोगों ने इसकी पूरी तरह से उपेक्षा कर रखी है। अपना पेट पालने के लिए हमारा शिक्षाकाल तो अधिकाँश में विदेशी भाषा और साहित्य का अध्ययन करने में ही निकल जाता है। इसलिए आपसे अनुरोध है की जिस आप वक़्त रहते वेदो का अध्ययन जरूर करें। और अच्छी ट्रांसलेशन वाली बुक को आप  vedrishi.com से खरीद सकते हैं।


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