ज्वार भाटा क्या है ? जानते हैं हिन्दी में

ज्वार भाटा क्या है ? जानते हैं हिन्दी में

हमारी धरती का 70% हिस्सा पानी से ढका हुआ है। जहां समंदर ज़मीन से मिलता है वहाँ पानी हर समय एक नियमित रूप से चढ़ता और उतरता है, जिसे Tides यानी ज्वार कहते हैं लेकिन ध्यान से देखने पर पता चलता है की ये ज्वार भाटा कभी कभी कुछ ज्यादा ही तीव्र हो जाता है,

धरती पर ज्वार चाहे कितनी भी उग्र क्यों न हो वो अंतरिक्ष की एक शक्ति की वजह से बनती हैं।  धरती पर ज्यादा टाइड चाँद की Gravity की वजह से बनती है। और कुछ हद तक सूरज की ग्रेविटी से भी। चाँद धरती एक बीच के हिस्से के मुकाबले उस हिस्से को अपनी ओर ज्यादा खींचता है जो उसके करीब है जिसकी वजह से धरती का वो हिस्सा चाँद की ओर थोड़ा सा उठ जाता है

वैसे ही चाँद धरती के सबसे दूर वाले हिस्से के मुकाबले उसके बीच वाले हिस्से को ज्यादा खींचता है जिस की वजह से चाँद से दूर वाला हिस्सा बाहर की और उभरता है यानी की धरती दोनों तरफ से थोडी उभरती है। ये उभरना दरअसल समुन्दर का उभारना होता है यानी एक हिस्सा चाँद  की तरफ उभरता है और एक चाँद से दूर उभरता है

ज्वार भाटा क्या है ? जानते हैं हिन्दी में

जब चाँद धरती का चक्कर लगाता है और धरती सूर्य के तो धरती के उभरने से पानी का स्तर बढ़ता और कम होता है।  जिस से ज्वार भाटा पैदा होते हैं। ये tides इतनी जबरदस्त होती हैं कि किसी की जान भी ले सकती हैं, ये tides पेड़ो को उखाड़ सकती हैं दुनिया के कुछ देश ऐसे हैं जहाँ ये ज्वार भाटा ( Tides ) तभी मचा देता है जैसे चीन, जापान, मलेशिए, और जितनी भी शहर समुद्री किनारे पर होते हैं वहां ज्वार भाटा से नुक्सान होने की सम्भावना बनी रहती है। आइये अब जरा संक्षित्प रूप में ज्वार भाटा को अलग अलग समझते हैं।


ज्वार भाटा क्या है –

चन्द्रमा और सूर्य के गुरुत्वाकर्षण शक्तियो के कारण सागरीय जल के ऊपर उठने तथा गिरने को ज्वार भाटा कहते हैं।

ज्वार (Tide) क्या है

सूर्य और चन्द्रमा के गुरुत्वाकर्षण बल के कारण सागर में छोटी-बड़ी लहरें बनती रहती हैं । इन छोटी-बड़ी लहरों का उफान मारकर आगे बढ़ना ही ज्वार कहलाता है ।

 भाटा (Ebb)क्या है –

उफान मारती हुई लहरों का आगे बढ़कर फिर से पीछे चला जाना ही भाटा कहलाता है।  हम ऐ सा भी कह सकते हैं कि ज्वार का पीछे लौटना भाटा कहलाता है।


ज्वार-भाटा के प्रकार –

दीर्घ अथवा उच्च ज्वार (SPRING TIDE)

ये ज्वार पूर्णिमा तथा अमावस्या के दिन आते हैं । चूँकि इस दिन सूर्य, पृथ्वी और चन्द्रमा तीनों एक ही सीध में होते हैं, इसलिए सूर्य तथा चन्द्रमा के सम्मिलित आकर्षण बल से पृथ्वी पर ऊँचे ज्वार की उत्पत्ति होती है । इनकी ऊँचाई सामान्य से 20 प्रतिशत अधिक होती है ।

लघु या निम्न ज्वार (NEAP TIDE)

शुक्ल या कृष्ण पक्ष की सप्तमी या अष्टमी को सूर्य और चंद्रमा पृथ्वी के केंद्र पर समकोण बनाते हैं। इस कारण सूर्य और चंद्रमा दोनों ही पृथ्वी के जल को भिन्न दिशाओं में आकर्षित करते हैं। फलतः इस समय उत्पन्न ज्वार औसत से 20% कम ऊँचे होते हैं। इसे लघु या निम्न ज्वार कहते हैं।

दैनिक ज्वार (DIURNAL TIDE)-

धरती की कुछ जगहों पर दिन में सिर्फ एक बार ही ज्वार आता है जिसको हम दैनिक ज्वार कहते हैं। दैनिक ज्वार 24 घंटे 52 मिनट के बाद आते हैं। मैक्सिको की खाड़ी और फिलीपाइन द्वीप समूह में दैनिक ज्वार आते हैं।

अयनवृत्तीय ज्वार(Anaerobic tide) – 

जिस तरह सूर्य उत्तरायण और दक्षिणायन होता है, उसी तरह चन्द्रमा भी उत्तरायण और दक्षिणायन होता है । जब चन्द्रमा का झुकाव उत्तर की ओर अधिक होता है, तो कर्क रेखा पर उठने वाले ज्वार ऊँचे होते हैं । ऐसा महीने में दो बार होता है।
ठीक इसी समय मकर रेखा पर भी अपकेन्द्रीय बल के कारण इतना ही ऊँचा ज्वार उत्पन्न होता है। इसे अयनवृत्तीय ज्वार कहते हैं ।

विषुवतरेखीय ज्वार (Equatorial tide)

जब चाँद की किरणें विषुवत रेखा पर लम्बवत पड़ती है तो उस समय जवार-भाटे की स्थिति में असमानता आ जाती है। ऐसी अवस्था में आने वाले ज्वार को विषुवत रेखीय ज्वार कहते हैं।


ज्वार भाटा के बारे में कुछ महत्वपूर्ण और रोचक तथ्य-

  • चन्द्रमा सूर्य से 2.6 लाख गुना छोटा है लेकिन सूर्य  की तुलना में  380 गुना पृथ्वी  के अधिक समीप है।  फलतः चन्द्रमा की उत्पादन की क्षमता सूर्य  की तुलना में 2.17 गुना अधिक है चन्द्रमा सूर्य  से 2.6 लाख गुना छोटा है लेिकन सूर्य की तुलना में 380 गुना पृथ्वी के अधिक समीप है, फलतः चन्द्रमा की उत्पादन की क्षमता  सूर्य  की तुलना में 2.17 गुना अधिक है।

  • पृथ्वी के प्रत्येक स्थान पर प्रतिदिन 12 घंटे और 26 मिनट के बाद ज्वार, और ज्वार के 6 घंटे 13 मिनट के बाद भाटा आता है ।
  • पृथ्वी का जो सतह (surface) है,  वह अपने केंद्र की तुलना में चन्द्रमा से लगभग 6400 km.निकट  है, अतः पृथ्वी के उस भाग में जो चाँद के सामने होता है , आकर्षण  अधिकतम होता है और ठीक उसके दूसरी ओर न्यूनतम।
  • अमावस्या और पूर्णिमा के दिन चंद्रमा, सूर्य और पृथ्वी एक सीध में होते हैं । अतः इस दिन अधिकतम ज्वार उत्पन्न होता रहता है ।
  • इंग्लैंड के दक्षिणी तट पर साउथहैंपटन में प्रतिदिन चार बार ज्वार आता है ।
  • ज्वार का असर पृथ्वी के हर जगह होता है परंतु समुद्र में तरल पानी की वजह से इसका असर हमें अच्छी तरह दिखाई देता है ।

प्रकृति में ईश्वर ने जितनी  चीजे भी बनायीं हैं वो किसी न किसी कारण से ही बनायीं होती हैं एक ब्रह्माण्ड का एक छोटा से छोटा कण भी बिना कारण का नहीं हो सकता इसी तरह अगर देखा जाये तो ज्वार भाटे यह प्रक्रिया अति उग्र रूप लेकर पूरी धरती पर तबाही मचा सकती है लेकिन  ऐसा होता नहीं है, इस  ज्वार भाटे के आने से भी कई फायदे होते हैं  –

(1) ये नदियों द्वारा लाये गये कचरों को बहाकर साफ कर देते हैं, जिससे डेल्टा के बनने की गति धीमी हो जाती है ।
(2) ज्वारीय तरंगें नदियों के जल स्तर को ऊपर उठा देती हंै जिससे जलयान आंतरिक बंदरगाहों तक पहुँच पाते हैं ।
(3) ज्वार-भाटा का उपयोग मछली पालने तथा मछली पकड़ने के लिए किया जाता है ।
(4) फ्रांस तथा जापान में ज्वारीय ऊर्जा पर आधारित विद्युत केन्द्र स्थापित किये गये हैं।

तो आशा करता हूँ ज्वार भाटा क्या है ? यह क्यों आता है ? ज्वार भाता क्या करता है ? इन सभी सवालों के जवाब आपको  इस आर्टिकल को पढ़कर मिल गया होगा।

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