सत्संग क्या है जीवन में सत्संग का महत्व | निरंकारी विचार

niranakri sangat | nirankari vichar | निरंकारी विचार

भाग्यवान होते हैं वह जिन्हें सत्यवादी पुरुषो की संगती मिलती है जैसे हीरे की खाने आम नहीं मिलती वैसे ही ग्यानी पुरुष स्थान- स्थान पर नहीं मिलते संसार के असंख्य लोगो में से इन्हें ढूंड कर इनका संग करना ही अपना भाग्य चमकाना है

जीवन में साथी तो अनेक मिल जाते हैं परन्तु संतो का संग भाग्य से मिलता है जैसे सांगत वैसी रंगत संत का संग हेम निरंकार परमात्मा के निकट करता है निसंदेह प्रभु सबके निकट ही है परन्तु यह महसूस केवल ब्रह्मज्ञानीयों को ही होता है वरना लोग प्रभु को उपर वाला कहकर पुकारते हैं

उत्तम जीवन जीने के लिए उत्तम पुरुषो की संगति करें पीतल, पारस  से छू कर सोना और भस्म होकर औसधि बान जाता है ऐसे ही प्रभु ने तो मानव जीवन को मन, बुद्धि एवं इन्द्रियां दी हैं इनको जैसे संगती  मिलती है वैसी ही विचारधारा एवं भावना बन जाती है और मानव वैसा ही कर्म करने लगता है

सत्संग वह दर्पण है जिसके सामने आते ही अपने मन, वचन, कर्म की त्रुटियाँ नज़र आने लगती है और आभास होने लगता है कि हमने नफरत, इर्ष्या, द्वेष, जलन, निंदा के काले धब्बो से अपने मन को मेल किया हुआ है संतो का संग उनके अमूल वचन और सदगुरु की रहमत से मन को साफ़ करना है

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संतो की संगति ही जीवन में वह बहार लाती है जो कभी पतझड़ में नहीं बदलती जिनके जीवन की बागडोर सदगुरु ने संभाली है, उनके कार्य स्वतः ही होते चले जाते हैं, वह चिंतामुक्त जीवन जीते हैं

सत्संग में रूचि रखने वाले भक्त सद्गुणों से अपने जीवन का श्रंगार करते हैं संतो के गुण सहजतः ही जीवन को प्रभावित करते रहते हैं और एक दिन ऐसा  आ जाता है कि संतो का संग अभिमानी को ज्ञानी बना देता है

संतो के वचन सुनना सुनकर ह्रदय में स्थान देना और फिर कर्म में ढालना ही जीवन में सुगन्धि भरना है शुभ कर्मो की सुगंधि दूर दूर तक फ़ैल जाती है और यही कर्म जीवन की शोभा बढ़ाते हैं

शीशा बड़ा हो या छोटा, हमें अपना चेहरा दिखा ही देता है इसी प्रकार से सत्संग में संतजनों की संख्या कम हो या अधिक, हमारे जीवन का रूपांतरण कर ही देती है

संतो का संग करके विशालता की और कदम बढ़ाना ही सत्संग का प्रभाव है सत्संग ही ह्रदय में से उंच-नीच, अमीर-गरीब, जाती मजहब की दीवारे गिराता है  प्रभु की रचना से प्रेम करना सिखाता है, सभी को अपने परमपिता की संतान मानकर समानता, विशालता एंवं विश्व बंधुत्व की भावना जागृत करता है

सत्संग से ही चिंतन पवित्र होता है जिससे आचरण और व्यव्हार का भी शुद्धिकरण हो जाता है और सदगुरु चरण में अनुराग दृढ होने लगता है

सत्संग से ही सुमति आती है और कुमति जाती है सत्संग मन को शुद्ध करके विचारधारा को सकारात्मक बनाता है और धीरे धीरे मानसिक रोगों से छुटकारा मिल जाता है

संतो का संग एक अमूल्य निधि है, एक वरदान है, जिससे संसार के अशांत प्राणी सीतलता और शांति का प्रसाद प्राप्त करते है सत्संग में पावन और नेक विह्कारो की अमृतधारा का पान करते करते वे बुरे संस्कारो को त्यागकर अध्यात्मिक उन्नति की और अग्रसर होते हैं फलतः काल और माया के प्रभाव से मुक्ति हो जाते है

सत्संग को “बेगमपुर” अथवा बैकुण्ठ इसलिए कहते हैं कि यहाँ प्रभु का यशोगान होता है, आत्मा को गुरुवचनो की खुराक मिलती है और सकारात्मक भावनाएं जागृत होती हैं यहाँ निंदा, इर्ष्या, द्वेष, वैर, विरोध, का कोई स्थान नहीं होता केवल गुरु यश और आनंद होता है साथ साथ गुरुसिख अपनी भूलो के लिए क्षमा याचना कर रहे होते हैं, जिस कारन आत्मा पूर्णतः पापो और गुनाहों के बोझ से मुक्त हो रही होती है चुन्तामुक्त जीवन बेगमपुर में ही नसीब होता है

सत्य-असत्य, धर्म-अधर्म को समझाने वाले विवेकी पुरुष की संगती में गुण स्वतः ही विकसित हो जाते हैं विवेकी पुरुष बनने  के लिए ज्ञानवान संतो की संगति अनिवार्य है

सभी संतो का आदर-सत्कार व सेवा बराबर करें क्योंकि साध संगत तो रब्बी पुरुषो की बनी एक माला के सामान के सामान होती है, जैसे माला का हर मोती महत्वपूर्ण होता है वैसे ही सभी सं महान होते हैं किसी ने ब्रह्मज्ञान बहुत पहले लिया हो या बाद में, इसका कोई फर्क नहीं पड़ता

यदि को मोती माला से बिखर कर टूट जाये तो उसकी न ही कीमत रहती है और न ही उपयोगिता यही अवस्था संगत से टूटे हुए एक गुरुसिख की होती है

ब्रह्मज्ञान सद्गुरु की कृपा से प्राप्त होता है, लेकिन इस पर विश्वाश महापुरुषों की सगत में आने से ही दृढ होता है सदगुरु पर विश्वाश सागर से भी गहरा हो, इसलिए परिपक्व संतो की संगत आवश्यक है

सत्संग वही होता है जो गुरु के हुक्मानुसार होता है सांसारिक प्रभाव के कारण कहीं पर यदि कोई अलग संगत करने का प्रयास करता है, भोले भोले गुरुसिख को फुसलाकर, कई गलतफहमिया पैदा करके गुटबंदी करता है तो यह सदगुरु को कतई पसंद नहीं, ऐसी मनमर्जी की संगत में जाने का न कोई फायदा है न कोई उपकार बल्कि गुरु के आदेश का उलंघन का दोष जरूर है, गुरुसिख चेतन रहें और जान लें कि संगत वही करनी है जो निश्चित स्थान, सत्संग भवन या जो सदगुरु की और से नियुक्ति प्रबंधक के द्वारा आयोजित है, उसी संगत में सदगुरू की रहमते बरसती हैं जो सदगुरु के आदेशानुसार होती हैं

संतो का संग ही हमारी उर्जा को शै दिशा देकर उसका उचित स्तेमाल करना सिखाता है यदि हुकूमतें भी लोगो की मजबूरियां कम करने, देश को प्रगति के पथ पर ले जाने की ओर देश को आगे बढ़ने में संतो का नेतृत्व लें, उनके जीवन की दिशा निर्देश में चलें तो कोई कारन नहीं कि देश आगे न बढे और पुरे विश्व  का नेतृत्व न करें

साध सांगत जी प्यार से कहना 

धन निरंकार जी 

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