सद्गुरू के वचन | निरंकारी विचार | nirankari vichar

guru k avachan nirankari vichar

सद्गुरु का वचन निरंकारी विचार

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  1. सद्गुरु के वचन की कद्र करना ही सही इबादत व बंदगी है हर वचन को निरंकार का हुक्म समझ कर मानना सर्वोत्तम कर्म है

  2. सद्गुरु का एक एक शब्द किसी को कोहिनूर हीरे से कम कीमती नहीं होता हीरे का मूल्य तो डाला जा सकता है परन्तु सद्गुरु के वचन अमोलक हुआ करते हैं संतो के वचन जो जीवन दान देने वाले होते हैं , वे भी अमूल्य हैं यही वचन मानाने वाला मानव मनमुख से गुरुमुख एवं अज्ञानी से ज्ञानी बन जाता है

  3. गुरु के वचन को केवल कानो से नहीं, मन की गहराइ से सुनना, एक एक वचन को हृदय में उतरना और उस पर आचरण करना, गुरु के वचनो का सम्मान है

  4. गुरु वचनों में मिलावट करना, उनमे फेर बदल करके दुसरो से सम्मुख पेश करना सबस बड़ा पाप है गुरु वचनों को ज्यो का त्यों दुसरो तक पहुचाना ही गुरसिख का कर्त्तव्य है

  5. अपना सुख सदौव गुरु  की और रखना, देश काल एवं समयानुसार गुरु का जो आदेश देता है उस आदेश का वचनानुसार जीवन को जीना अपने जीवन को आनंददायी बनाना है 

  6. सत्य का मार्ग फूलों की सेज नहीं, काँटों पर चलने के सामान है इस पर चलने के लिए जहाँ  गुरु की कृपा संतजनों की सांगत और निरंतर प्रार्थनाएं चाहिए, वही  जिन करियो को करने से और इन बातो से सावधान रहने के लिए गुरु कहता है, उन पर अभी ध्यान देकर सत्य के कठिन मार्ग पर चला जा सकता है 

  7. सद्गुरु के वचनों को पूर्णतः उसी रूप में मानना जिस रूप में कहे गए हैं ही गुरमत है ,गुरु वचनों के अर्थ अपनी मनमर्जी एवं अपनी मनमर्जी एवं सुविधा अनुसार निकालना मनमुख बनकर अपने  पाव पर आप कुल्हाड़ी मरना है 

  8. गुरु का वचन सदा सुखदाई होता है इस पर अपने मन को दृढ़ रखना है यदि वचन मन की इच्छा के विपरीत भी आ जाये तो भी वचन को मानने में ही भक्त की भलाई है 

  9. भक्त की अपनी कोई योजना, इच्छा सोच नहीं  होती, गुरु के वचनानुसार कार्य करना ही भक्त की सोच व योजना का केंद्र बिंदु होता है 

  10. निरंकार व सद्गुरु दुखभंजन है, ये किसी को दुःख नहीं देते, अपनी ही सोच व कर्म के कारण कोई मनुष्य दुःख को जीवन में आमंत्रित करता है, गुरु का वचन मनाने वाले दुखो से बचे रहते हैं . उनक ह्रदय में आठो पहर आनंद की लहर दौड़ती रहती है

    गुरु ऊँची ऊँची बातो या व्याख्यानों से नहीं, कर्म से खुश होता है, गुरु वचनो को कर्म में ढालने वाला गुरसिख जीवन काल में और मरणोपरांत भी असंख्य गुरु भक्तो के लिए प्रेरणा का स्रोत बना रहता है 


  11. गुरु के निकट वह मनुष्य नहीं जो हर समय गुरु के पास रहता है गुरु के निकट वह है जो गुरु के वचनो और अपने ह्रदय के निकट रखता है एवं उन्हें जीवन में अपनाता है 

  12. जो मन की मने उसे मनमुख कहा जाता है और जो गुरु के वचनों पर फूल चढ़ाये उसे गुरुमुख कहते हैं, गुरुमुख बनकर पूरा जीवन गुरु के आदेशानुसार व्यतीत करना या मनमुख बनकर मनमर्जी करना दोनों रस्ते खुल जाते हैं गुरु ने सृष्टि दी है विवेक जागृत किया है अब चुनाव भक्त ने स्वयं करना है 

  13. गुरु सुखदाता एवं तीन काल दर्शी होता है, इसका हर आदेश पारिवारिक व सामाजिक, मानसिक व अध्यात्मिक जीवन में बहार लाने वाला होता है , वर्तमान में भले ही गुरु का वचन समझ न आये तभ भी गुरु का वचन मान लेना चाहिए, हो सकता है कुछ समय पश्चात् उस वचन की कद्र पड़े जिसने उसे आगे वाले दुखो, परेशानियों व उलझनों से बचाया है 

  14. गुरु के वचन को अपनाने में यदि दुनिया का क्रोध एवं विरोध भी सहन करना पड़े, इसकी खातिर सारे जग से टक्कर भी लेनी पड़े तो भी वचन का पालन करना गुरसिख की पहचान और शान है जो उसे अन्य प्राणियों से उत्तम दर्जा दिलाती है 

  15. स्वार्थी लोग जो किसी स्वार्थपूर्ण के लिए संगत में आते हैं, गुरु का वचन कटाने के लिए उकसाते हैं ताकि वे महापुरुषों की सेवा भावना से अनुचित लाभ उठा सके, ऐसे लोगो से सदैव सावधान रहना अपनी भक्ति की कमाई को बचाना है 

  16. जो निरंकार को भूल जाता है, माया अपन भ्रम जाल बिछाकर उसको अपने चंगुल में फंसा देती है, ऐसा बेमुख व्यक्ति उलझनों के चक्रव्यूह से बाहर ही नहीं निकल पाता और सदैव परेशां रहता है 

  17. सदगुरु का वचन मनना ही सदगुरु का सत्कार है , वचन मानकर यदि हम सेवा, सुमिरन, सत्संग करते हैं तो संतो द्वारा आशीर्वाद सदगुरु का ही मिल रहां होता है 

  18. जैसे दुनियावी सरकार का हुक्म ही हमरे पास पहुंचता है, स्वयं हाकम नहीं , इसी तरह सद्गुरु का हुक्म ही इसके गुरसिखो द्वारा हमरे पास पहुंचता है, हमने हुक्म को मानकर सुख प्राप्त करने हैं, हील हुज्जत करके दुःख इकठे नहीं करने 

विचार- राज वासदेव सिंह

धन निरंकार जी 

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प्रार्थना ऐसी होनी चहिये 

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