मोक्ष क्या है ?

मोक्ष क्या है ?

दोस्तों मोक्ष को लेकर आपके मन में भी बहुत सवाल होंगे जैसे कि – क्या मुक्ति और मोक्ष एक ही हैं ? या इनमे कोई  अंतर है ? हम मोक्ष को क्यों प्राप्त करें ? मोक्ष की  आवश्यकता क्यों है ? क्या माया से मुक्ति ही मोक्ष है ? या कर्मबन्धन से मुक्ति मोक्ष है ? यह टॉपिक एक ऐसा विषय है जिसके बारे में लोग विस्तार से नहीं जानते हैं, इसलिए सरल शब्दों की व्याख्या में और प्रमाणों के द्वारा हम आज इसको विस्तार से जानेंगे।

मोक्ष क्या है ? –

मोक्ष क्या है ?
मोक्ष क्या है ?

यदि में सरल शब्दों में समझने क लिए हमें पहले दुःख को समझना होगा क्योंकि मोक्ष का आधार सुख दुःख ही है। दोस्तों संसार में सभी लोग सुखी और दुखी होते हैं और जब से जन्म लिया है तब से और मृत्यु तक सुख दुःख हमारे साथ बने रहते हैं। इस विषय में कबीर दस जी अपने विचार कुछ इस प्रकार रखे थे –

 कबीरा जब हम पैदा हुए, जग हँसे हम रोय  

वहीं तुलसीदास जी ने श्रीराम चरितमानस में लिखा- जनमत मरत दुसह दुःख होई यानि हमारे जन्म से लेकर मरण तक हमको दुःख घेरे हुए है।

अगर ध्यान देकर सोचे तो व्यक्ति हर वक़्त दुखी है  जन्म में भी दुःख होता है, बचपन में खिलोने न मिलने पर दुःख, यदि कोई खिलौना छीन कर ले गया तो फिर भी दुःख थोड़े से बड़े हुए तो स्कूल में सही रिजल्ट न आने पर दुःख, थोड़े से और बड़े हुए तो अच्छी जॉब न मिलने का दुःख और जब शादी हो जाती है तब तो एक से बढ़कर एक जिम्मेदारियां कंधो पर आ जाती हैं। और फिर बुढ़ापे में लोग कई रोगो से ग्रस्त हो जाते हैं। तो ऐसा भी नहीं है की सिर्फ दुःख ही दुख आते हैं सुख और  दुःख बराबर आते रहते हैं।

अब मैं आपको भगवद गीता और बृहदरण्यकोपनिषद के दो श्लोक बताता हूँ जिनको आप अपने ध्यान में रखिये क्योंकि यही दो श्लोक है जो मोक्ष को समझने में आधार सिद्ध होंगे। भगवान श्रीकृष्ण ने गीता के अध्याय दो के 62-63 श्लोक में कहा है कि –

ध्यायतो विषयान्पुंसः संगस्तेषूपजायते ।
संगात्संजायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते ॥2.62॥
क्रोधाद्‍भवति सम्मोहः सम्मोहात्स्मृतिविभ्रमः ।
स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति ॥2.63॥

भावार्थ : विषयों का चिन्तन करने वाले पुरुष की उन विषयों में आसक्ति हो जाती है, आसक्ति से उन विषयों की कामना उत्पन्न होती है और कामना में विघ्न पड़ने से क्रोध उत्पन्न होता है॥62॥ क्रोध से अत्यन्त मूढ़ भाव उत्पन्न हो जाता है, मूढ़ भाव से स्मृति में भ्रम हो जाता है, स्मृति में भ्रम हो जाने से बुद्धि अर्थात ज्ञानशक्ति का नाश हो जाता है और बुद्धि का नाश हो जाने से यह पुरुष अपनी स्थिति से गिर जाता है॥63॥

वही बृहदरण्यकोपनिषद 4-5-6  नेब में कहा गया है –

न वा अरे सर्वस्य कमाय सर्वं
प्रियं भवत्यात्मनस्तु कमाय सर्वं प्रियं भवति। 

भावार्थ : हमारी सभी कामनाएं दूसरे के सुख के लिए नहीं अपितु अपने सुख के लिए होती हैं।

मुक्ति क्या है ?

किसी से छुटकारा पाने के लिए मुक्ति कहते हैं यह मुक्ति की एक सरल व्यख्याय है किन्तु शाश्त्रो में दुःख से छुटकारा पाने को मुक्ति कहा गया है। शाश्त्रो के अनुसार मुक्ति दो प्रकार की होती है

1 – अनित्य या क्षणिक दुःख मुक्ति – इस प्रकारी की निवृति में बस कुछ देर के लिए ही आप दुखो से मुक्ति पा सकते  हैं। जैसे जब मनुस्य सो जाता है या ध्यान की अवस्था में होता है तब उसे किसी प्रकार का दुःख नहीं होता किन्तु जब नींद खुलती है या ध्यान टूटता है और मनुस्य जागृत अवस्था में आ जाता है तो काम क्रोध लोभ जैसी भावनाओ से पुनः घिर जाता है। इसलिए इस तरह की मुक्ति को प्रायः मुक्ति कहा जाता है, यान कुछ पल के लिए दुखो के छुटकारे को अनित्य या क्षणिक मुक्ति कहते हैं।

1 -नित्य या आत्यंतिक दुःख मुक्ति – इस तरह की मुक्ति को मोक्ष कहते हैं नित्य या आत्यंतिक दुखी मुक्ति का मतलब है सदैव के लिए दुखो से मुक्ति और आनंद दोनों मिल जाने को मोक्ष कहते हैं। यानी मोक्ष एक ऐसी अवस्था है जिसमे व्यक्ति सदा के लिए दुखो से मुक्त हो जाता है और सदा के लिए आनंद युक्त होता है

तैत्तीरियोपनिषद 2.7.2 में कहा गया है कि रसो वे सः रास ह्योवायं लब्ध्वाआनंदी भवति। यानि  वही रस है यह ( जीवात्मा )  इस रस को प्राप्त करके ही आनंद युक्त होता है। तो इस प्रकार सदा के लिए दुखो से मुक्ति और और आनंद दोनों के मिल जाने को मोक्ष कहते हैं।

मनुस्य दुखी क्यों है ? इसके बारे में वेद कहते हैं कि मनुस्य दुखी इसलिए है क्योंकि वह माया के इस लोक में उसके आधीन है। मनुस्य माया के लोक में यानि इस संसार में क्यों है ? वह है अपने कर्मो के कारण क्योंकि मनुस्य कर्म करता है इसलिए कर्मबन्धन होता है जिसके कारण उसको पुनर्जन्म लेना पड़ता है।

प्रश्नोपनिषद में 3.7 में कहा गया है – पुण्येन पुण्यं लोकं नयति पपेन पापमुभाभ्यामेव मनुस्यालोकं 

अर्थात – मनुस्य पुण्य कर्मो के द्वारा पुण्य लोक में जाता है पाप कर्मो के द्वारा नर्क में, और पाप और पुण्य के मिश्रित कर्मो से पुनः मनुस्य लोक में जाता है।

श्वेताश्वतरोपनिषद 1.8  में कहा गया है कि – अनीशश्वात्मा बध्यते भोक्तृभावाज ज्ञात्वां देवं मुच्यते सर्वपाशै: 

जीवात्मा इस जगत के विषयो का भोक्ता बना रहने के कारण, प्रकृति (माया) आधीन असमर्थ हो, इसमें बंध जाता है, और उस परमेश्वर को जानकर सब प्रकार के बंधनो से मुक्त हो जाता है। इस मनुस्य लोक में मनुस्य अनेक प्रकार के बंधनो से बंधा हुआ है जैसे – माया का बंधन, त्रिकर्म का बंधन, त्रिदोष का बंधन, पंचकोश का बंधन, काल का बंधन तो इन्ही सभी बंधनो से मुक्ति का नाम मुक्ति है।  यदि मनुस्य सभी कर्मो से छुटकारा पा लेता है तो उसको मोक्ष मिल जाता है लेकिन हम कर्म करने वाले मनुस्य माया के तीन गुणों  ( त्रिगुणो ) के आधीन हैं।  जिसको आप नीचे दिए हुए चित्र के अनुसार  भी समझ सकते हैं।

मोक्ष क्या है ?

जो लोग नास्तिक होते हैं या ईश्वर में विश्वास नहीं रखते हैं उनका सवाल होता है की मोक्ष जरुरी क्यों है आखिर हम क्यों मोक्ष प्राप्त करे तो इसका सीधा सा उत्तर है की हम बिना किसी के कहे ही मोक्ष चाहते हैं इसलिए  मोक्ष चाहते हैं। इसलिए मोक्ष चाहते हैं, तो इसमें सवाल ही नही उठता क्योंकि दुखो से तो सभी लोग मुक्ति चाहते हैं चाहे वो आस्तिक हो या नास्तिक हो, आनंद भी सभी पाना चाहते हैं चाहे वो आस्तिक हो या नास्तिक। तो यह दोनों यदि किसी को मिल जाये तो कहा जाता है की वह मोक्ष को प्राप्त हो गया।

मोक्ष एक  अवस्था है, जिसके लिए किसी तरह के शरीर त्याग की आवश्यकता नहीं होती यह पूर्णतया इस जीवन में शशरीर सहित हसिल की जाने वाली स्थिति है। भगवान की प्राप्ति या मोक्ष मरने से पहले प्राप्त करना होता है क्योंकि मरने के बाद कर्म करने का अधिकार नहीं है मरने से पहले किसी को मोक्ष की अवस्था प्राप्त हो गयी तब वह मरणोपरांत परम गति को प्राप्त होगा। सूरदास, तुलसीदास, मीरा, प्रह्लाद, परीक्षित आदि भक्तों ने पहले मोक्ष प्राप्त किया, पहले भगवान् को प्राप्त किया फिर संसार छोड़ने के बाद वे परम गति को प्राप्त हए।


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