क्या सिकंदर ने पोरस को हराया था ? आइये जानते हैं

क्या सिकंदर ने पोरस को हराया था ? आइये जानते हैं

पश्चिमी सभयता पर आँख बंद करके भारतीय लोग भरोसा कर लेते हैं, मैं यह बात जरूर कह सकता हूँ कि आज के समय  Technology के मामले में पश्चिमी देश हमसे आगे हैं, लेकिन आज से 2000  वर्ष पहले भारत सभी देशो से सबसे, सुख संपन्न, शिक्षित, देश था जिसको सोने की चिड़िया भी कहा जाता था।  326  ईसा पूर्व  जब पौरव राष्ट्र के राजा पोरस और मेसेडोनिया के राजा सिकंदर के बीच एक घमासान युद्ध हुआ जिसको हम झेलम का युद्ध ( The Battle of the Hydaspes) के नाम से जानते हैं।  लेकिन दुर्भाग्य से कहना पड़ता है कि सिकंदर को महान बनाने के लिए सिकंदर के इतिहासकारों ने सिकंदर की हार को भी उसकी जीत में लिख दिया। इस पर तर्क-वितर्क करके हम आज समझेंगे की कैसे पोरस की जीत को उन्होंने सिकंदर की जीत बताया, और हमारे इतिहास में भी यही पढ़ाया जाता है।  पश्चिम जो कहता है दुनिया उसे आंख मूंदकर मान लेती है। मगर ईरानी और चीनी इतिहास के नजरिए से यह छवि कुछ अलग ही दिखती है।

यूनानी इतिहासकारों के झूठ को पकड़ने के लिए ईरानी और चीनी विवरण और भारतीय इतिहास के विवरणों को भी पढ़ा जाना चाहिए। यूनानी इतिहासकारों ने सिकंदर के बारे में झूठ लिखा था, ऐसा करके उन्होंने अपने महान योद्धा और देश के सम्मान को बचा लिया और दुनियाभर में सिकंदर को महान बना दिया। हालांकि यह पूरी सत्य बिलकुल नहीं लगता।

पोरस और सिकंदर 


सिकंदर का भारत पर आक्रमण :-

सिकंदर अपने पिता की मृत्यु के पश्चात अपने सौतेले व चचेरे भाइयों का कत्ल करने के बाद यूनान के मेसेडोनिया के सिन्हासन पर बैठा था। अपनी महत्वाकांक्षा के कारण वह विश्व विजय को निकला। उसकी खास दुश्मनी ईरानियों से थी। सिकंदर ने ईरान के पारसी राजा दारा तृतीय को पराजित कर दिया और विश्व विजेता कहलाने लगा। यहीं से उसकी भूख बड़ गई। सिकंदर को ईरानी कृति ‘शाहनामा’ ने महज एक विदेशी क्रूर राजकुमार माना है महान नहीं।

प्रसिद्ध इतिहासकार एर्रियन लिखते हैं, जब बैक्ट्रिया के राजा बसूस को बंदी बनाकर लाया गया, तब सिकंदर ने उनको कोड़े लगवाए और उनकी नाक-कान कटवा डाले। इतने पर भी उसे संतोष नहीं हुआ। उसने अंत में उनकी हत्या करवा दी। उसने अपने गुरु अरस्तू के भतीजे कलास्थनीज को मारने में संकोच नहीं किया। एक बार किसी छोटी-सी बात पर उसने अपने सबसे करीबी मित्र क्लीटस को मार डाला था। अपने पिता के मित्र पर्मीनियन जिनकी गोद में सिकंदर खेला था उसने उनको भी मरवा दिया। सिकंदर की सेना जहां भी जाती, पूरे के पूरे नगर जला दिए जाते, सुन्दर महिलाओं का अपहरण कर लिया जाता और बच्चों को भालों की नोक पर टांगकर शहर में घुमाया जाता था।

यह भी पढ़ें – दुनिया के top 10 महान जांबाज योद्धा | top 10 Greatest Warriors

जब सिकंदर ईरान से आगे बड़ा तो उसका सामना भारतीय सीमा पर बसे छोटे छोटे राज्यों से हुआ। भारत की सीमा में पहुंचते ही पहाड़ी सीमाओं पर भारत के अपेक्षाकृत छोटे राज्यों अश्वायन एवं अश्वकायन की वीर सेनाओं ने कुनात, स्वात, बुनेर, पेशावर (आजका) में सिकंदर की सेनाओं को भयानक टक्कर दी। मस्सागा (मत्स्यराज) राज्य में तो महिलाएं तक उसके सामने खड़ी हो गईं, पर धूर्त और धोखे से वार करने वाले यवनी (यूनानियों) ने मत्स्यराज के सामने संधि का नाटक करके उन पर रात में हमला किया और उस राज्य की राजमाता, बच्चों सहित पूरे राज्य को उसने तलवार से काट डाला। यही हाल उसने अन्य छोटे राज्यों में किया। मित्रता संधि की आड़ में अचानक आक्रमण कर कई राजाओं को बंधक बनाया। भोले-भाले भारतीय राजा उसकी चाल का शिकार होते रहे। अंत में उसने गांधार-तक्षशिला पर हमला किया। और तक्षशिला के राजा आम्भी ने सिकंदर को रोकने के बजाये उसका स्वागत किया और उसके साथ संधि कर दी, क्योंकि  पौरव राष्ट्र के साथ तक्षशिला के सम्बन्ध अच्छे नहीं थे।  सिकंदर ने भी आम्भी को यह लालच दिया की यदि वह भारत पर आक्रमण करने के लिए सिकंदर की सहायता करेगा तो सिनकदर उसको तक्षशिला के साथ पौरव राष्ट्र और भारी मात्रा में धन दौलत भी देगा। और आम्भी ने सिकंदर के साथ सन्धि कर ली और भारत की रक्षा करने की बजाये उल्टा भारत पर हमला करने में सिकंदर की सहायता भी करने लगा।  इस लिए भारत का सबसे पहला गद्दार, देशद्रोही शाशक तक्षशिला के तक्षशिला के राजा आम्भी को ही माना जाता है। क्योंकि आचार्य चाणक्य के लाख समझाने के बाद भी पौरवो से अपनी आपसी दुश्मनी की आग में जलकर उसने देशद्रोह करना ही उचित समझा।

पोरस कौन था :-

महाराजा पोरस सिंध-पंजाब सहित एक बहुत बड़े भू-भाग के स्वामी थे। जिनके माता का नाम अनुसूया और पिता का नाम बमनी था। पौरव राजा बमनी और तक्षशिला के राजा आम्भी के बीच पहले से ही एक दूसरे के दुशमन थे।  उसके पश्चात्  पोरस अपने माता-पिता और सम्पूर्ण प्रजा के सहयोग से पौरव राष्ट्र का राजा बना। पोरस आपसी दुश्मनी मिटाने और अखंड भारत का स्वप्न देखने लगा। भारत में ऊपर की तरफ से घुसने के लिए हर व्यक्ति को सिंध पार करना पड़ता था और यहाँ के एक बड़े भूभाग पर राजा पोरस का ही साम्राज्य था। उनका साम्राज्य वर्तमान पंजाब में झेलम और चेनाब नदियों तक (ग्रीक में हाइडस्पेश और एसीसेंस) था। पोरस का कार्यकाल 340 ईसा पूर्व से 315 ईसा पूर्व के बीच माना जाता है। उस समय भारत 16 अलग अलग राज्यों में बंटा हुआ था, जिनको महाजनपद के नाम से जाना जाता था,

  1. अंग
  2. अश्मक (या अस्सक)
  3. अवंती
  4. चेदि
  5. गांधार
  6. काशी
  7. काम्बोज
  8. कोशल
  9. कुरु
  10. मगध
  11. मल्ल
  12. मत्स्य (या मछ)
  13. पांचाल
  14. सुरसेन
  15. वज्जि
  16. वत्स (या वंश)

पोरस और आम्भी का जनपद गांधार और कम्बोज के अंतर्गत आता था, उस वक़्त भारत के सभी शाशक बड़े ही शक्तिशाली थे लेकिन आपसी दुश्मनी के कारण उनमे एकता नहीं थी। इस जनपद के अंतर्गत छोटे छोटे इलाको पर तो सिकंदर ने धोखे से हमला करके जीत लिया था,  उसके पश्चात्  तक्षशिला के राजा अम्भि से संधि करके उसने पोरस पर आक्रमण करने की योजना बनायी।

झेलम का युद्ध ( Battle of the Hydaspes )


क्या सिकंदर ने पोरस को हराया था ? आइये जानते हैं
झेलम युद्ध का काल्पनिक दृश्य

326  ईसा पूर्व जब सिकंदर ने पोरस पर हमला किया तो उसको बुरी तरह से मुँह की कहानी पड़ी थी। जो सिकंदर मकदूनिया से लेकर तक्षशिला तक बिना हारे पहुँच गया था। लेकिन पोरस के सामने उसकी और उसके सिपाहियों की हिम्मत भी अपना दम तोड़ने लगी थी। जिससे सिकंदर पोरस के प्रति और क्रूर होता जा रहा था, और भारत पर राज्य करने का सपना देख रहा था, लेकिन उसके सिपाही  इतने युद्ध करते करते अब थक चुके थे, इसी बीच सिकन्दर ने किसी छोटी सी बात पर अपने सबसे करीबी मित्र क्लीटस भी हत्या हत्या कर दी। हालाँकि सिकन्दर को इसका दुःख भी हुआ। सिकंदर खुद को खुदा समझने लगा था, और सोचने लगा था की उसको कोई नहीं हरा सकता है।  उसकी इन हरकतों ने और अपने सेना के सिपाहियों के अच्छे से पेश न आने से उसकी सेना आपस में विद्रोह करने लगी ।

यह भी पढ़ें – दुनिया के 10 सबसे बुद्धिमान व्यक्ति | Top 10 Most Intelligent People

पश्चिमी इतिहासकारो के अनुसार   326  ईसा पूर्व  जब सिकंदर और पुरु के बीच झेलम का घमासान युद्ध हुआ तो उस समय, Alexander की सेना में 50 हज़ार से भी अधिक सैनिक थे जबकि पोरस के सैनिकों की संख्या 20 हज़ार के क़रीब थी।  पोरस ने सिकंदर की सेना के सामने अपनी सेना के हाथी खड़े कर दिये, जिससे सिकंदर भी दंग रह गया था क्योंकि यवनो का मुकाबला ज़िन्दगी में पहली बार हाथियों से हुआ था। जिस से यवन और यवनो का राजा सिकंदर ( Alexandra ) भी दंग रह  रह गया था।

युद्ध का वर्णन :-

राजा पुरु या पोरस के शत्रु लालची आम्भी की सेना लेकर सिकंदर ने झेलम पार की। राजा पुरु जिसको स्वयं यवनी 7 फुट से ऊपर का बताते हैं, अपनी शक्तिशाली गजसेना के साथ यवनी सेना पर टूट पड़े। पोरस की गज सेना ने यूनानियों का जिस भयंकर रूप से संहार किया था उससे सिकंदर और उसके सैनिक आतंकित हो उठे थे। भारतीयों के पास विदेशी को मार भगाने की हर नागरिक के हठ, शक्तिशाली गजसेना के अलावा कुछ अनदेखे हथियार भी थे जैसे सातफुटा भाला जिससे एक ही सैनिक कई-कई शत्रु सैनिकों और घोड़े सहित घुड़सवार सैनिकों को भी मार गिरा सकता था। इस युद्ध में पहले दिन ही सिकंदर की सेना को जमकर टक्कर मिली। सिकंदर की सेना के कई वीर सैनिक हताहत हुए। यवनी सरदारों के भयाक्रांत होने के बावजूद सिकंदर अपने हठ पर अड़ा रहा और अपनी विशिष्ट अंगरक्षक एवं अंत: प्रतिरक्षा टुकड़ी को लेकर वो बीच युद्ध क्षेत्र में घुस गया। कोई भी भारतीय सेनापति हाथियों पर होने के कारण उन तक कोई खतरा नहीं हो सकता था, राजा की तो बात बहुत दूर है। राजा पुरु के भाई अमर ने सिकंदर के घोड़े बुकिफाइलस (संस्कृत-भवकपाली) को अपने भाले से मार डाला और सिकंदर को जमीन पर गिरा दिया। ऐसा यूनानी सेना ने अपने सारे युद्धकाल में कभी होते हुए नहीं देखा था। ऐतिहासिक स्रोतों से पता लगता है कि इस युद्ध में भयंकर बारिश भी हुई थी जिस से यह युद्ध अत्ययन्त भयावह हो गया था।  यदि आप 2004 में आयी हॉलीवुड की फिल्म  Alexander जिसमें सिकंदर के जीवन को शुरू से अंत तक इतिहास के लेखो के अनुसार दिखाया गया है। उस में देखेंगे तोउन्होंने खुद यह बताया गया है, कि झेलम के युद्ध में घमासान युद्ध में जब सिकंदर का घोडा बुकिफाइलस मरा और सिकंदर घायल हो गया था, तो सिकंदर के सैनिक किसी तरह घायल सिकंदर को वहां  से बचा ले गए और वही पर युद्ध समाप्त हो गया। और पोरस जीत गया। कुछ दिनों तक तक्षशिला में सिकंदर का उपचार हुआ।  सिकंदर की सेना का मनोबल भी इस युद्ध के बाद टूट गया था और  से इनकार कर दिया था। वहीं झेलम के युद्ध में हुए भीषण संघार को देखकर सिकंदर ने वापस मकदूनिया ( Macedonia )  लौटने का फैसला किया, और वह वापस लौट गया। इस युद्ध में सिकंदर इतना घायल हो चूका था कि जिसकी वजह से अपने घर मकदूनिया लौटते वक़्त वह जब बेबीलोन में था तभी उसकी मृत्यु 323 ईसा पूर्व में  हो गयी थी।

हारे हुए सिकंदर का सम्मान और उसकी प्रतिष्ठा बनाए रखने के लिए यूनानी लेखकों ने यह सारा झूठा जाल रचा, और लिखा कि- “महान सम्राट पोरस को हराकर बंधक बनाकर जब सिकंदर के सामने पेश किया गया तो सिकंदर ने पूछा- ‘तुम्हारे साथ क्या किया जाए तो पोरस ने कहा- ‘मेरे साथ वो व्यवहार करो, जो एक राजा दूसरे राजा के साथ करता है।” और इस से सिकंदर बहुत खुश हुआ और उसने पोरस को जीवन दान दे दिया और उसको उसका साम्राज्य लौटा दिया।

और इसी झूटी बात को हमारे इतिहास में पढ़ाया जाता है, जो की सरासर गलत है, अब आप ही विचार कीजिये की जो सिकंदर इतना क्रूर था जो किसी पर रहम नहीं करता था और जिसने बचपन से ही भारत पर राज करने का स्वपन देखा था, जिस पोरस को वह हर हाल में मारना चाहता था, जो पोरस सिकंदर का जानी दुश्मन बन गया था,  और जिस पोरस ने उसको इतना नुकसान पहुँचाया, भला वह सिर्फ इतनी बात से पोरस को कैसे छोड़ सकता था, जितना नुकसान उसको फारस के राजा दारा तृतीय ( Darius iii )  ने नहीं पहुँचाया उस से कई गुना अधिक नुकसान  उसको पोरस ने पहुँचाया , तो भला ऐसे में  क्रूर सिकंदर कैसे पोरस को जीवन दान दे सकता था।  और चलो हम मान भी लेते हैं कि की उसने पोरस को जीवन दान दे दिया था, तो Macedonia से जिस भारत पर राज करने के सपने को लेकर वह चला था, तो फिर वापस क्यों लौट गया वह आगे क्यों नहीं बढ़ा।  जो अपने आप को दुनिया का खुदा मानता था।  जो समझता था कि उसको कोई नहीं हरा सकता वह जीतने के बाद भी वापस क्यों लौट गया।  यह बात संदेह उत्पन्न करती है। और चार प्रश्न खड़े होते हैं।

  1. अगर सिकंदर का बचपन से सपना था कि वह भारत (सोने की चिड़िया ) पर राज करेगा, और उतनी दूर से वह फारस जैसी बड़ी सल्तनत को जीतकर यहाँ तक पहुंचा तो फिर वह एक ही लड़ाई लड़कर वापस क्यों चला गया ।
  2. उसने जितने भी राजाओ को युद्ध में हराया सबका क़त्ल किया तो फिर पोरस तो उसके रस्ते का सबसे बड़ा काँटा था, फिर उसने पुरु (पोरस) को क्यों नहीं मारा ।
  3. उसने तक्षशिला के देशद्रोही रजा को कहा था की तुम भारत पर युद्ध करने में हमारा साथ दो और फिर पोरस को हराने के बाद मैं तुमको पोरस का सारा राज्य दे दूंगा फिर उसने पोरस का राज्य तक्षशिला के राजा को क्यों नहीं दिया ।
  4. पश्चिमी इतिहासकारों ने सिकंदर के भारत से वापस जाने की एक सटीक वजह क्यों नही दी, मुझे लगता है उनके इतिहासकारों ने सिकंदर को उसको महान बनाने के लिए झेलम के युद्ध में उसकी जीत लिखी मगर यह झूट है।

इतिहास को निष्पक्ष लिखने वाले विद्वान प्लूटार्क का कहना है कि इस युद्ध में यवन लगातार आठ घंटे तक लड़ते रहे   लेकिन इस बार किस्मत ने उनका साथ नहीं दिया। स्ट्रेबो, श्वानबेक आदि विदेशी विद्वानों ने तो कई स्थानों पर इस बात का उल्लेख किया है कि मेगस्थनीज आदि प्राचीन यूनानी लेखकों के विवरण झूठे हैं। ऐसे विवरणों के कारण ही सिकंदर को महान समझा जाने लगा और पोरस को एक हारा हुआ योद्धा, जबकि सचाई इसके ठीक उलट थी। सिकंदर को हराने के बाद पोरस ने उसे छोड़ दिया था, जिस से सिकंदर वापस लौट गया। इसलिए यूनानी इतिहासकारों के झूठ को पकड़ने के लिए ईरानी और चीनी विवरण और भारतीय इतिहास के विवरणों को भी पढ़ा जाना चाहिए। यूनानी इतिहासकारों ने सिकंदर के बारे में झूठ लिखा था, ऐसा करके उन्होंने अपने महान योद्धा और देश के सम्मान को बचाया।

सिकंदर एक शक्तिशाली कूटनीतिज्ञ योद्धा SONY TV पर आने वाले शो पोरस  में इस बार देखते हैं कि किसकी जीत दिखाई जाती है, पोरस को न्याय  मिलने की आशा करता हूँ। इस  बारे में आप क्या सोचते हैं और आपका क्या ख्याल है ? कमेंट में जरूर बताएं।

यह भी पढ़ें – दुनियां के 10 क्रूर शाशक

ये हैं दुनिया के 10 सबसे खतरनाक देश

Share post, share knowledge

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *