क्या आत्मा अमर है ?

क्या आत्मा अमर है ?

कोई मर गया, मरने पर क्या? शरीर तो यहीं है। कोई हलचल नहीं है। यह सोच आई कि शरीर में से कुछ निकल गया, इसलिए मृत्यु हुई।कौन/क्या बाहर गया? यह जो निकला उसे बुद्धि और इंद्रियों से जाना नहीं जा सकता थाl तो कैसे जाने?हमें समझने फिर भगवान का शब्द आया, वेद, गीता, आदि के रूप में। इन्होने यह समझाया कि वह निकलने वाली चीज नित्य है।

यमराज नचिकेता को समझाते हुए बताते हैं कि आत्मा ना जन्मती है ना ही मरती है-…… शरीर के नष्ट होने पर भी नष्ट नहीं होती है— कठ उपनिषद्१/२/ १८। नित्य है तो कहीं रहती भी होगी, शरीर को त्यागने के पश्चात। वह रहने की जगह दूर किसी स्थान पर है, तब तो यह चीज कहीं पर जाती भी होगी। अगर कहीं जाती होगी तो कहीं से आती भी होगी। बस इसी से पुनर्जन्म और परलोक का सिद्धांत पैदा हुआ।

श्रीकृष्ण ने आत्मा का एक शरीर से दूसरे शरीर में जाने को पुराने कपड़े त्यागकर नए कपड़े पहनना बताया —श्रीमद्भागवत गीता२/२२। हमारा यह शरीर, क्षेत्र का छोटा-सा हिस्सा है, जो 24 तत्वों से बना हुआ है। पाँच महाभूत: पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश, पाँच ज्ञानेंद्रियाँ, पाँच कर्मेंद्रियाँ, पाँच इंद्रियों के विषय और प्रकृति, मन, बुद्धि व अहंकार–श्रीमद् भगवतगीता१३/५ ।

मृत्यु के समय स्थूल शरीर यहाँ रह जाता है। बाकी सब मन बुद्धि इंद्रियाँ आदि इसमें से निकल जाते हैं। विवेक चूड़ामणि 98 के अनुसार यह स्थूल शरीर चमड़े माँस, रक्त, नसें, चर्बी, मज्जा और हड्डियों का समूह है, इसमें मल-मूत्र भी भरा हुआ रहता है। यह शरीर भोगायतन है, भोग का घर है। इसकी अवस्था को जागृत अवस्था कहा गया है। अभिमानी जीव को विश्वपुरुष कहा गया है और सूक्ष्म शरीर पाँच कर्मेंद्रियाँ, पाँच ज्ञानेंद्रियाँ, पाँच प्राण, मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार, अविद्या, काम और कर्म का बना हुआ होता है। इसे लिंग शरीर भी कहते हैं। यह वासना से युक्त होने के कारण कर्म फलों का अनुभव कराने वाला है। इसकी अवस्था स्वप्न अवस्था होती है। इसके अभिमानी जीव को तेजस पुरुष कहते हैं। वेदांती स्थूल शरीर को अन्नमय कोष कहते हैं, सूक्ष्म शरीर को प्राणमय और एक तीसरा शरीर बताते हैं जिसके कारण शरीर और आनंदमय कोष कहते हैं । सूक्ष्म शरीर का स्थूल शरीर से बाहर निकल जाना मृत्यु कहलाती है और स्थूल शरीर से युक्त हो जाना जन्म कहलाता है।

जीव को एक स्थान से दूसरे स्थान पर अर्थात अन्य लोकों में जाने के लिए अतिवाहिक शरीर दिया जाता है । यह शरीर बिना पृथ्वी और जल तत्व का होता है। इसमें अग्नि वायु और आकाश तत्व होते हैं। कोई कोई विद्वान इस शरीर को केवल आकाश तत्व से बना हुआ मानते हैं। शरीर से बाहर निकलने वाले तत्वों के साथ ही आत्मा, जो की वास्तविक हम हैं, भी निकलती है।देव ऋषि नारद राजा प्राचीनबर्हि को समझाते हुए बताते हैं कि त्रिगुणमय संघात ही लिंग शरीर है। यही चेतना से युक्त होकर जीव कहा जाता है। इस लिंग शरीर में पाँच ज्ञानेंद्रियाँ, पाँच कर्मेंद्रियाँ, पाँच प्राण और एक मन, ऐसे 16 तत्व नारद जी ने बताए हैं- श्रीमद् भागवत४/२९/७४।

कोई कोई अहंकार, बुद्धि और चित्त को भी जोड़ते हैं। सूक्ष्म शरीर के साथ सारे कर्म और संस्कार, जो उसी का हिस्सा हैं, भी जाते हैं। इसके द्वारा पुरुष भिन्न-भिन्न देहों को ग्रहण करता है और त्यागता है तथा इसी से उसको हर्ष, शोक, भय, दुख और सुख आदि का अनुभव होता है। मृत्यु के तुरंत बाद दूसरा शरीर नहीं मिलता, नया शरीर मिलने में थोड़ा समय लगता है।

इसलिए जब तक दूसरी योनि नहीं मिलती तब तक अतिवाहिक शरीर में रहता है। इसे उदाहरण से समझें। मान लें गंगदत्त का निधन हो गया। इसका अभिप्राय है कि उसके स्थूल शरीर से लिंग शरीर निकल गया। यह लिंग शरीर कहीं आ जा नहीं सकता। मान लो गंगदत्त को स्वर्ग मिलना है। तो उसे अतिवाहिक शरीर मिलेगा जिससे वह स्वर्ग जाएगा। वहाँ पर उसे स्वर्ग के भोग भोगने के लिए शरीर मिलेगा जिसमें वह, अतिवाहिक शरीर को छोड़कर, लिंग शरीर के साथ प्रवेश करेगा और स्वर्ग के भोग भोगेगा। मान लो उसे नर्क भुगतवाना है तो पहले वह अतिवाहिक शरीर से नर्क में जाएगा, वहाँ उसका लिंग शरीर अतिवाहिक शरीर त्याग कर, नर्क के यातना शरीर में प्रवेश करेगा और नरक की यातना भोगेगा। यही अन्य लोकों के लिए मानें। यह मन प्रधान लिंग शरीर ही जीव के जन्म आदि का कारण है।

क्या आत्मा का भी ‘लिंग’ होता है ?

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विज्ञान के ऊर्जा संरक्षण सिद्धांत के अनुसार ऊर्जा को ना तो उत्पन्न किया जा सकत है और ना ही नष्ट ऊर्जा का केवल रूपांतरण होता है।

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