हिन्दुओं में जातिवाद की सच्चाई क्या है ?

हिन्दुओं में जाति प्रथा की सच्चाई क्या है ?

आज हिन्दू लोग अपनी ही अज्ञानता के कारण जातिवाद में  टूट कर  बिखर गए हैं। जिस भारत को सोने की चिड़िया कहा जाता था, उस भारत का विनाश इसी जातिवाद ने किया और आज भी यह जातिवाद का यह कैंसर हिन्दुओं में बरक़रार है। आप  सोच रहे होंगे कि सोने की चिड़िया का जातिवाद से क्या सम्बन्ध आइये समझते हैं।

जब भारत में वैदिक शाश्त्रो की मान्यता थी तब भारत धन-धान्य, सुख सम्पन, धन-दौलत से भरपूर एक सुशिक्षित राष्ट्र था, इस कारण भारत को सोने की चिड़िया कहा जाता था। लेकिन धीरे-धीरे लोग वर्ण को जाती समझने लगे और साथ ही साथ भेद भाव भी पैदा होने लगा, जब तक  विदेशियों ने भारत पर हमला नहीं किया था तब तक यह जातिवाद की बीमारी बड़ा संकट नहीं थी अपने आपस की बात थी।  लेकिन 710 ईसवी में जब मोहम्मद बिन कासिम ने सिंध के हिन्दू राजा दाहिर सेन पर हमला करके उसको हराया, और देबल पहुँचकर उसने स्थानीय पुजारियों और नागरिकों को मारा और वहाँ के सारे महान मंदिरो को नष्ट किया और वहां इस्माल दीन को स्थापित कर दिया। यही वह पहला आक्रमण था जो किसी मुस्लिम द्वारा यह भारत पर किया गया था। और इस तरह वह धीरे धीरे छोटे छोटे स्थानीय जगहों पर कब्ज़ा करता गया इस्लाम को स्थापित करता गया और हिन्दुओ के मंदिरो को तोड़ता गया और ब्राह्मणो को मारता गया। और इस तरह भारत में मुसलमानो का आगमन हुआ। हिन्दू धर्म जिसको हम वैदिक धर्म भी कहते हैं उसका एक कथन है वसुधैव कुटुम्बकम जिसका मतलब होता है कि सारी दुनिया एक परिवार है। इसलिए भारत के राजाओ ने भी मोहम्मद बिन कासिम पर ज्यादा गौर नहीं किया। उसके बाद महमूद गज़नी ने भारत पर हमला किया लेकिन वह साम्राज्य करने नहीं सिर्फ धन लूटने आया था जिसमे वह सफल भी हुआ।  फिर मोहम्मद गौरी ने पृथ्वीराज चौहान के साथ तराइन का पहला युद्ध ( 1191 ) में लड़ा जिसमे मोहम्मद गोरी  बुरी तरह  पराजित हुआ और मैदान से जान बचाकर भाग गया।

फिर एक साल बाद गौरी अपनी दुगनी सेना को लेकर पृथ्वीराज पर हमला करने के लिए आया और 1192 में फिर हुआ तराइन का दूसरा युद्ध, इसमें मोहम्मद गौरी के पास एक लाख सैनिक थे जबकि पृथ्वीराज के पास सिर्फ बीस हज़ार सैनिक थे उसके बावजूद पृथ्वीराज ने गौरी का जमकर मुकाबला किया भले ही अंततः वे गौरी से हार गए। और इस तरह दिल्ली में मुस्लिम साम्राज्य स्थापित हुआ। गौरतलब है कि इस से पहले पृथ्वीराज ने गौरी को 16 बार हराया था और उसको ज़िंदा छोड़ दिया था जो पृथ्वीराज और भारत की सबसे बड़ी भूल थी। बाद में गौरी ने पृथ्वीराज चौहान  को बंदी बना लिया गया। और गौरी ने गर्म सलाखे करके पृथ्वीराज की आंखे फोड़ डाली और अन्य बहुत बुरी प्रताड़नाएं  देने के बाद आखिरकार पृथ्वीराज को मारने का फैसला किया। उसके बाद लगातार और भी आक्रमण हुए और हिन्दुओ का विनाश होकर मुस्लिम फैलते गए। (इसका कारण अंत में समझाऊंगा उस से पहले बीच का पार्ट जरूर पढ़ें )

जाति प्रथा के बारे में श्रीमद भगवद्गीता क्या कहती है ?


चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः।     
तस्य कर्तारमपि मां विद्ध्यकर्तारमव्ययम्।।4.13।।

भावार्थ : चार वर्णों की रचना मैंने की है, तथा उनको गुण और कर्मो के आधार पर चार भागो में बांटा गया है, ये सब करते हुए भी तू मुझ नाशरहित को अकर्ता ही जान।


ब्राह्मणक्षत्रियविशां शूद्राणां च परन्तप।

कर्माणि प्रविभक्तानि स्वभावप्रभवैर्गुणैः৷৷18.41৷৷

भावार्थ : हे परंतप! ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्यों के तथा शूद्रों के कर्म स्वभाव से उत्पन्न गुणों द्वारा विभक्त किए गए हैं ৷৷18.41॥

शमो दमस्तपः शौचं क्षान्तिरार्जवमेव च।
ज्ञानं विज्ञानमास्तिक्यं ब्रह्मकर्म स्वभावजम्‌ ৷৷18.42৷৷
भावार्थ : अंतःकरण का निग्रह करना, इंद्रियों का दमन करना, धर्मपालन के लिए कष्ट सहना, बाहर-भीतर से शुद्ध रहना, दूसरों के अपराधों को क्षमा करना, मन, इंद्रिय और शरीर को सरल रखना, वेद, शास्त्र, ईश्वर और परलोक आदि में श्रद्धा रखना, वेद-शास्त्रों का अध्ययन-अध्यापन करना और परमात्मा के तत्त्व का अनुभव करना- ये सब-के-सब ही ब्राह्मण के स्वाभाविक कर्म हैं ৷৷18.42॥

शौर्यं तेजो धृतिर्दाक्ष्यं युद्धे चाप्यपलायनम्‌।
दानमीश्वरभावश्च क्षात्रं कर्म स्वभावजम्‌৷৷18.43৷৷
भावार्थ : शूरवीरता, तेज, धैर्य, चतुरता और युद्ध में न भागना, दान देना और स्वामिभाव- ये सब-के-सब ही क्षत्रिय के स्वाभाविक कर्म हैं ৷৷18.43॥

कृषिगौरक्ष्यवाणिज्यं वैश्यकर्म स्वभावजम्‌।
परिचर्यात्मकं कर्म शूद्रस्यापि स्वभावजम्‌৷৷18.44৷৷
भावार्थ : खेती, गोपालन और क्रय-विक्रय रूप सत्य व्यवहार (वस्तुओं के खरीदने और बेचने में तौल, नाप और गिनती आदि से कम देना अथवा अधिक लेना एवं वस्तु को बदलकर या एक वस्तु में दूसरी या खराब वस्तु मिलाकर दे देना अथवा अच्छी ले लेना तथा नफा, आढ़त और दलाली ठहराकर उससे अधिक दाम लेना या कम देना तथा झूठ, कपट, चोरी और जबरदस्ती से अथवा अन्य किसी प्रकार से दूसरों के हक को ग्रहण कर लेना इत्यादि दोषों से रहित जो सत्यतापूर्वक पवित्र वस्तुओं का व्यापार है उसका नाम ‘सत्य व्यवहार’ है।) ये वैश्य के स्वाभाविक कर्म हैं तथा सब वर्णों की सेवा करना शूद्र का भी स्वाभाविक कर्म है ৷৷18.44॥

यहाँ से सिद्ध होता है कि जन्म से हम किसी का भी वर्ण निर्धारित नहीं कर सकते जैसे जैसे वह बड़ा होगा और जैसे-जैसे उसके कर्म होंगे वैसे ही उसका वर्ण हो जायेगा। इसलिए कहा जाता है कि कोई भी मनुष्य जन्म से नहीं कर्म से महान होता है। यदि कोई व्यक्ति शूद्र, क्षैत्रिय, या वैश्य किसी के भी घर में पैदा होता है और उसकी पढ़ने पढ़ाने का काम करता है शाश्त्रो का अध्ययन करता है तो फिर वह ब्राह्मण कहलायेगा। इस तरह अगर कोई किसी भी वर्ण वाले घर में पैदा क्यों न हुआ हो यदि वह शूरवीर, साहसी, धैर्यवान है तो वह क्षत्रिय कहलायेगा चाहे वह ब्राह्मण के घर ही पैदा क्यों न हुआ हो। और ऐसे ही यदि कोई व्यक्ति ब्रह्माण्ड के घर पैदा हुआ हो लेकिन वह ब्राह्मणो जैसे कर्म न करता हो तो वह ब्राह्मण नहीं कहलायेगा।  इसलिए जन्म से इंसान कुछ भी नहीं होता है उसके कर्म ही उसका वर्ण निर्धारित करते हैं।
जातिवाद
हिन्दुओं में जाति प्रथा जातिवाद की सच्चाई क्या है ?
वर्ण व्यवस्था के अनुसार चाहे व्यक्ति कही भी (ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य शूद्र ) किसी के भी घर में पैदा क्यों ना हुआ हो  यदि उसको शाश्त्रो का ज्ञान है पढ़ने पढ़ाने में रूचि है और वेदो का अध्ययन करता है यज्ञ पूजा पाठ करने की विधियों को जनता है तो वही ब्राह्मण कलायेगा।  और यदि ऐसा व्यक्ति पढ़ाने, पूजा पाठ (Teaching, Hawan, Yagya ) का काम करे तो लोग अच्छे से शिक्षित हो जायेंगे और अपने शाश्त्रो को अच्छे से समझेंगे ।
वर्ण व्यवस्था के अनुसार चाहे व्यक्ति कही भी (ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य शूद्र ) किसी के भी घर में पैदा क्यों ना हुआ हो  यदि उसमें साहस, धैर्य, बल, देशप्रेम, आदि जैसे गुण है तो वह क्षत्रिय कहलायेगा। और यदि ऐसा व्यक्ति देश का रक्षक बने, सैनिक बने, प्रजा की रक्षा करे, करे तो यह अति उत्तम होगा।
वर्ण व्यवस्था के अनुसार चाहे व्यक्ति कही भी (ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य शूद्र ) किसी के भी घर में पैदा क्यों ना हुआ हो  यदि उसमें खेती, गोपालन,  क्रय-विक्रय रूप सत्य व्यवहार, व्यापार (Business) करने की रूचि है तो ऐसा व्यक्ति वैश्य कहलायेगा।  और यदि ऐसा व्यक्ति देश की अर्थव्यवस्था को सँभालने का काम करे तो यह बहूत अच्छा होगा।
वर्ण व्यवस्था के अनुसार चाहे व्यक्ति कही भी (ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य शूद्र ) किसी के भी घर में पैदा क्यों ना हुआ हो  यदि  वह अपने आजीवन के लिए उपर्युक्त सब वर्णों की सेवा करता हो तो वह शूद्र कहलायेगा। इस प्रकार जो व्यक्ति कुछ नहीं कर सकता वह बाकियो की सेवा तो कर ही सकता है।
तो इस प्रकार आप अच्छे से समझ गए होंगे की कोई भी व्यक्ति कही भी पैदा हो सकता है और कोई भी व्यक्ति अपने कर्मो से कसी भी वर्ण को प्राप्त कर सकता है। जिसकी जैसी योग्यता उसका वैसा वर्ण। तो इस प्रकार हमने देखा की वर्णो के अनुसार ऊंच-नीच, छोटे-बड़े, भेद-भाव, छूआ-छूत कभी आ ही नहीं सकती क्योंकि सारे वर्ण एक दूसरे के बिना अधूरे हैं। इनमे से कोई भी एक वर्ण ना हो तो देश चल ही नहीं सकता।
यदि सब कुछ है और सेवा करने वाला कोई शूद्र नहीं है तो भी अधूरा।
यदि सब कुछ है और शिक्षा देने वाला कोई ब्राह्मण नहीं तो भी अधूरा।
यदि सब कुछ है और रक्षा करने वाला कोई क्षत्रिय नहीं तो भी अधूरा।
यदि सब कुछ है और क्रय-विक्रय के लिए कोई वैश्य नहीं तो भी अधूरा।

हिन्दुओ के विनाश का कारण जातिवाद कैसे बना ?


हिन्दू लोगों ने वर्ण को जाति का नाम दे दिया और उसको भी कर्म ( Profession ) की जगह जन्म (Birth ) के आधार पर बांट दिया, जिस कारण छुआ छूत भेद भाव बढ़ गया, और जो जहाँ पैदा हुआ उसको वही मान लिया गया, चाहे वह कैसा भी कर्म कर रहा हो। इस वर्ण व्यवस्था को सही से न समझ पाने का परिणाम क्या हुआ मैं आपको बताता हूँ –
अब जैसे कोई व्यक्ति ब्राह्मण के घर में पैदा होता है तो चाहे वह ब्राह्मणो जैसे कर्म कर रहा है या नहीं कर रहा है।  चाहे उसको शाश्त्रो का ज्ञान है या नहीं चाहे उसके पास शिक्षा, दीक्षा हो या ना हो उसको तब भी ब्राह्मण ही माना जाता है क्योंकि वह ब्राह्मण के घर में पैदा हुआ है। अब अगर ऐसा अज्ञानी वयक्ति को हम ब्राह्मण मानेंगे तो देश का क्या हाल होगा आप खुद सोचें।
जैसे कोई व्यक्ति क्षत्रिय के घर में पैदा हुआ है तो उसको भी क्षत्रिय ही मान लिया जाता है चाहे वह वीर, साहसी हो या न हो, चाहे उसके अंदर प्रजा की रक्षा करने का भाव हो या न हो चाहे वह कायर ही क्यों न हो तब भी उसको सिर्फ इस वजह से क्षत्रिय माना जाता है क्योंकि वह क्षत्रिय के घर पैदा हुआ है अब अगर ऐसे लोगो को आप देश की सेवा में, प्रजा की सेवा में लगाओगे तो देश का क्या हाल होगा आप खुद सोचें।
और अगर कोई वैश्य के घर में पैदा हुआ है और उसको व्यापर करना नहीं आ रहा है क्रय-विक्रय, लेन देन, करना ही नहीं आ रहा है Business का उसको B भी पता नहीं है तो फिर भी उसको सिर्फ इसलिए वैश्य माना जाता है की वह वैश्य घर में पैदा हुआ।  और अगर ऐसे लोगो के हाथ में देश की अर्थव्यवस्था दी जाए तो देश का क्या हाल होगा आप खुद सोचें।
और यदि कोई व्यक्ति शूद्र के घर में पैदा हुआ लेकिन उसको शश्त्रो का  ज्ञान है वेदो का अध्ययन करता है ज्ञानी है शिक्षित है फिर भी उसको सिर्फ यह कहकर पढ़ाने की अनुमति न दी जाये की वह शूद्र है, या उसको इसलिए ब्राह्मण न कहा जाये क्योंकि वह शूद्र के घर में पैदा हुआ है। या फिर शूद्र घर में जन्म व्यक्ति अति शौर्यवान, साहसी, पराक्रम, धैर्य वाला है लेकिन उसको फिर भी शूद्र घर में पैदा होने की वजह से उसको क्षत्रिय न कहा जाये या सेना में शामिल न होने दिया,और इसी प्रकार यदि कोई शूद्र घर में जन्मा व्यक्ति व्यापर में अति निपुण है लेकिन फिर भी उसको इसलिए वैश्य में शामिल न किया जाए, तो फिर इस तरह की व्यवस्था हमारी सुरक्षा और शिक्षा और व्यापर को कभी आगे नहीं बढ़ा  सकती और देश प्रगति ही नहीं कर सकता।
और यही हाल आज हमारे हिन्दू धर्म में हुआ है। चाहे कोई शूद्र ब्राह्मणो जैसे कर्म क्यों न करे उसको फिर भी ब्राह्मण नहीं कहते।और एक ब्राह्मण शुद्रो जैसे कर्म करे तब भी उसको ब्राह्मण ही कहते हैं, क्योंकि कर्म से नहीं लोग जाती को देखते हैं जो एकदम गलत है और यही हिन्दू धर्म की बहुत बड़ी विडम्बना है। यही हिन्दू धर्म के विनाश का कारण है जो अपने आपस में ही जातिवाद में बंट रहे हैं टूट रहे हैं, बिखर रहे हैं, जिसका फायदा दूसरे दीन, पंथो के लोग उठा रहे हैं।

हिन्दू राजाओ की हार का कारण जातिवाद –


मुस्लिमो का भारत में आगमन के लिए भी यह जातिवाद ही कारण है क्योंकि  युद्ध में लड़ने के लिए क्षत्रिय जाते थे और उस वक़्त की सारी सेना में क्षत्रिय कुल के लोगो को ही चुना जाता था भले उनके अंदर सामर्थ्य हो या न हो और चाहे कुल जनसंख्या में क्षत्रिय कम ही क्यों न हो इस प्रकार ब्राह्मण वैश्य और शूद्र इन तीनो की सुरक्षा की जिम्मेदारी सिर्फ क्षत्रिय कुल में पैदा हुए लोगो के कंधो पर डाली जाए तो वह अपर्याप्त होगा। और जातिवाद के कारण यही काम हिन्दू शाशको ने भी किया और न ही ब्राहम्णो ने उनका सही से मार्गदर्शन किया। परिणाम स्वरुप विदेशियों को भारत में अपने पैर जनमे के मौके मिल गए। और हिन्दुओ का विनाश शुरू हो गया। यदि योग्यता के आधार पर सैनिको का चयन ब्राह्मणो , वैश्यों, शुद्रो से भी किया जाता तो सेना मजबूत भी होती और बड़ी भी और सबमे एकता भी जिस से किसी विदेशी की भारत पर पैर रखने की हिम्मत नहीं हो पाती।

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आज भारत सरकार जब आर्मी  की भर्ती करती है तो यह नहीं देखती की लड़का किस जाती का है किस धर्म का अगर वह सारे Physical, technical, मापदण्डो पर खरा उतरता है और उसको योग्य समझा जाता है तो बिना किस जातिवाद के उसको सेना में शामिल कर लिया जाता है। तो यहां भी कर्म के आधार पर चुना जाता है जन्म के आधार पर नहीं, इसलिए हमारी भारतीय सेना वर्ण व्यवस्था का पूरा पालन कर रही है और यही वजह है की वह इतनी मजबूत है।  अगर सेना में भी जातिवाद चलता तो शायद पाकिस्तान अब तक कश्मीर पर कब्ज़ा कर चुका होता। सेना के अलावा बाकि सरकारी कार्यालओं में जातिवाद अभी भी है इसलिए उनकी हालत बदतर ही हैं।

इस लेख पर मेरी राय – 


मैंने अपनी तरफ से पूरी कोशिश की है, कि मैं अपनी बात आप लोगो को सरल शब्दों में पंहुचाउँ की जातिवाद हमारे लिए कितना बड़ा ज़हर है इस ज़हर को ज्यादा मत फैलने दो हिन्दुओं एक हो जाओ अभी भी वक़्त है। हिन्दुओ की संस्कृति, संस्कार, वेद, शाश्त्र बहुत महत्वपूर्ण है जिसको पूरा विश्व धीरे-धीरे अपना रहा है, जहाँ बाकी दीन पंथो की पवित्र किताबे विज्ञान के सामने घुटने टेक रही हैं, और जिनसे लोगो का विश्वाश उठता जा रहा है वही भगवद्गीता, योग, और वेद पूरी दुनिया में आज हर एक मापदण्ड पर खरा उतर रहे हैं और विश्व को सही सुगम रास्ता दिखा रहे हैं। बड़ी बड़ी यूनिवर्सिटी में वेदो को पढ़ाया जा रहा है। इसलिए इस जातिवाद से ऊपर उठ जाओ और एक हो जाओ।  इसी में सबकी भलाई है।

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