गुरसिख का चरित्र व आचरण कैसा होना चाहिए | निरंकारी विचार

Nirankari-Sewa-Dal | निरंकारी विचार
  • चरित्र ही व्यक्तित्व है सद्व्यवहार व उत्तम किरदार ही गुरमुख की पहचान है मधुर वाणी, नम्रता, निश्छल लेन-देन जैसे गुणों से ही गुरसिख समाज को प्रभावित कर सकता है वह अपने चरित्र व व्यव्हार के प्रति सदैव चेतन रहता है
  • गुरमुख मन रूपी धरती में सत्य का बीजारोपण करता है, इसी से जीवन में मानवता के सभी गुण भर सकते हैं, एक सच्चा इंसान ही सच्चा धर्मी हो सकता है
  • जो अपने यश की आशा रखता है, यश व मान-सत्कार उस से कोसो दूर भागते हैं और जो सहज भाव से अपना कर्म करता रहता है यश, इज्जत, शोहरत उसे सहज ही प्राप्त हो जाते हैं
Nirankari-Sewa-Dal | निरंकारी विचार
Nirankari-Sewa-Dal
  • सदैव अपने अवगुण और दुसरो के गुण देखने हैं, बुरे से बुरे व्यक्ति में भी प्रभु ने कोई न कोई गुण रखा है, उसके गुण को ढूडने , अपनाने एवं उसके अवगुण को नज़रंदाज़ कर देने में ही जीवन का आनंद है
  • संत महापुरुष प्रभु द्वारा विशेष कार्य के लिए चुने गए हैं , उन्होंने ही प्रभु का नियम धरती पर स्थापित करना है, हो सकता है इस कारण उनको अपमानित होना पड़े या पीड़ा सहन करनी पड़े, पीडा सहन करके भी वे धैर्य में रहकर सत्यमार्ग पर अग्रसर होते रहते हैं
  • गुरसिख सदैव मर्यादा में रहता है , जैसे पानी जब तक मर्यादा में बहता है दरिया कहलाता है और आस-पास के क्षेत्र को  हरियाली एवं ठंडक डा है, इसी प्रकार संतजन मर्यादा में रहकर मानवता को बचाता है,. मानवजाति का कल्याण करते हैं और इसका गौरव बनते हैं
  • निरंकार के नियमो के अनुसार प्रभु इच्छा में जीवन जीकर जीवन कला सिखाने वाले सदैव सितारों की भांति चमकते हैं और सम्मान से याद किये जाते हैं
  • गुरुभाई ही पक्के एवं सच्चे रिश्तेदार होते हैं  वे सगे संबंधियों से भी अधिक प्रिय हैं, क्योंकि इनसे  हमारा नाता शरीर त्यागने के बाद भी रहेगा, गुरुभाइयो से हमारा रिश्ता आत्मिक है, आत्मा कभी नहीं मरती इसलिए यह अंता कभी खत्म नहीं होता
  • भूलकर भी हमने किसी गुरुभाई का तिरस्कार या अपमान नहीं करन है, गुरुभाई की निरादारी करना नाम रूपी दौलत को कम करना है, सदगुरु को यह कदाचित स्वीकार नहीं कि एक गुरुसिख दुसरे गुरुसिख की निरादारी करे, जिस दिन कुछ ऐसा कर्म हो जाये, समझ लेना चाहिए कि वही दिन जीवन का सबसे बड़ा मंदभाग्य  दिवस है, ऐसे कुछ ही क्षण भक्त को भक्ति के मार्ग से हजारो कदम पीछे धकेल देते हैं
  • यदि कोई गुरुभाई भक्ति के मार्ग से भटक जाये, माया के मोह-जाल में फंस जाये तो हमें तब तक चैन से नहीं बैठना है जब तक उसे दुबारा गुरु चरणों में न ले आयें, यह हमारा परम कर्त्तव्य है और प्रभु कृपा के शुक्राने  का ढंग भी ,
  • भक्ति मार्ग पर चलना बारीक़ तार पर गुज़ारना होता है, जैसे दो खम्बे के उपर एक बारीक़ तार बाँधी होती है और कलाबाज उस तार पर बहुत संभल संभल कर चलता है, उसकी थोड़ी सी असावधानी उसके नीचे गिरने का कारण बन सकती है, इसी प्रकार भक्ति मार्ग इतना नाजुक है कि एक छोटा सा गलत बोल या गलत कदम भक्ति की ऊंचाई से हमारी गिरावट का कारण बन सकता है
  • गुरसिख गुरु की शिक्षा का एक चलता-फिरता विद्यालय है, वह जहाँ भी हो सफ़र कर रहा हो या किसी सामजिक उत्सव में हो, अपने गुरु की रहमतो व ब्रह्मज्ञान से प्राप्त हुई प्रकाशमय जिंदगी की चर्चा अवस्य करता है, कोई उसकी बात सुनकर गुरुचरणों की और कदम बढ़ाये या उसकी हंसी उडाये, उसे कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि वह तो गुरु महिमा गाकर ही आनंद प्राप्त कर रहा होता है
  • गुरु और निरंकार में कोई भेद नहीं होता, जब निरंकार का ध्यान करे तो गुरु की मूरत सामने हो और जब गुरु के दर्शन करे तो गुरु का विराट रूप निरंकार दिखाई दे
  • गुरु की मूरत इस कदर मन में बसी रहे जैसे हमारे मन में हमारा नाम, यदि सपने में भी या गहरी नींद में में भी कोई  हमारा नाम लेकर पुकारे तो हम एक दम सुचेत हो जाते हैं, इसी प्रकार हमारे सुचेत एवं अचेत मन में गुरु बसा हो
  • निरंकार एवं सदगुरु की सहायता उन्हे मिलती है जिनके ह्रदय में दया, करुणा, प्रेम, विशालता एवं सदभावना का वास रहता है जो दुसरे की भलाई की कामना करता है प्रभु की और से उसका भला सहज में ही हो जाता है 
  • हमें सदगुरु के हुक्म को सदैव प्राथमिकता देनी है प्रभु एवं सद्गुरु के हुक्म में रहकर ही जीवन महान हो सकता है स्वेच्छा को गुरु के हुक्म में विलीन करना ही भक्ति की चरम सीमा है 
  • माया भक्तो की दासी होती है दासी को दासी के स्थान पर ही रहने दें, सिर का ताज बनायेंगे तो परेशानिया का बोझ भी उतना ही बढ़ेगा 
  • जो  जीवन का लक्ष्य माया इकट्ठी करना मानते हैं, वही पश्चाताप के आंसू रोते हैं नाम रूपी दौलत, सांसारिक धन दौलत से कही उत्तम है, नाम रुपी दौलत को कमाने के लिए सांसारिक धन-दौलत को सेवा में खर्च करना होता है 
  • अभिमान करने वाले कभी सत्कार नहीं पाते , चाहे वे बलशाली हों, कला-प्रवीण हो, सामर्थ्य हो अथवा राजा ही क्यों न हो किसी की मजबूरी को देखकर उसकी हंसी नहीं उडानी है, प्रभु को स्वीकार नहीं कि उसके बन्दे उसकी दी हुई ताकतों का दुरूपयोग करके किसी का अपमान करे या किसी को अपने से नीचा समझे 
  • विनम्रता वह आभूषण है जो सौंदर्य को सदैव बनाये रखता है गुरसिख यदि बहुत योग्य और बुद्धिमान भी हो तो भी अपने आपको अनजान ही समझता है ताकि वह दुसरे महापुरुषों से बहुत कुछ सीख पाए , जो विनम्र भाव रखता है वही भक्ति में ऊँचा स्थानं प्राप्त करता है 
  • परिस्थितिया कैसी भी हों गुरसिख का विश्वास कभी कमजोर नहीं पड़ता गुरसिखी अलूणी सिल चाटने के सामान है यह तलवार से तीखी और सर के बाल से बारीक़ है गुरसिखी भले ही कठिन है परन्तु सुखदाई भी है और परम पद की प्राप्ति का माध्यम भी 
  • सदगुरु के आशीर्वाद के पात्र बनाने से बढ़कर अन्य कोई प्राप्ति नहीं केवल गुरुसिखी ही एक ऐसा मानसिक स्टार है जहाँ द्वेष का नाश हो जाता है कोई बेगाना नहीं, सभी अपने लगते हैं ऐसे गुरसिख को सदगुरु के आशीर्वाद प्राप्त होते रहते हैं 
  • ब्रह्मज्ञान के पश्चात् निरंकार एवं सदगुरु को अंतर्यामी मानना ही गुरमत का आरंभ है निरंकार के भय में रहकर ही भक्ति पूर्ण होती है

    भय बिन भक्ति न होय 

Share post, share knowledge

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *