गुंजन सक्सेना। Gunjan Saxena (The Kargil Girl)

गुंजन सक्सेना। Gunjan Saxena (The Kargil Girl) –

आज से 20 साल पहले वायुसेना में महिलाओं को आज की तरह फुल कमीशन नहीं दिया जाता था, बल्कि शॉर्ट सर्विस कमीशन के जरिए 7 सालों तक ही देश की सेवा करने का मौका मिलता था। उस वक्‍त सुरक्षा बलों में पुरुष अधिकारियों का वर्चस्व था और भारतीय वायुसेना में महिला अधिकारियों को पुरुषों के बराबर उड़ान भरने का मौका नहीं दिया जाता था.

ऐसे में सैन्य परिवार से ताल्लुक रखने वाली एक लड़की जो कि हंस राज कॉलेज से ग्रेजुएशन कर रही थी और साथ ही साथ दिल्ली के सफदरगंज फ्लाइंग क्लब ज्वाइन को भी ज्वाइन कर चुकी थी . उस समय उसके पिता और भाई दोनों ही भारतीय सेना में कार्यरत थे. इसी दौरान उन्‍हें पता चला कि IAF में पहली बार महिला पायलटों की भर्ती की जा रही है. और फिर क्या था। ………उन्होंने SSB परीक्षा दी और पास भी हो गयीं। और इस प्रकार दो महिलाएं को 1994 में भारतीय वायुसेना के पहले 25 ट्रेनी पायलटों के बैच में बतौर पायलट शामिल होने का मौका मिला था।

हालांकि उस वक्‍त भारतीय वायुसेना में महिला पायलटों के लिए आरक्षण था लेकिन महिला अधिकारियों को लड़ाकू जेट उड़ाने की अनुमति नहीं थी, लेकिन इस लड़की ने भारतीय वायुसेना में पहली बार विमान उड़ाकर इतिहास तो रच ही दिया था.साथ ही वो कर दिया जो उस वक़्त नामुमकिन सा था।

लेकिन तब यह साफ नहीं था कि वे उड़ान भरने के लिए मानसिक और शारीरिक तनाव और युद्धों का सामना कैसे करेंगी ? इस लड़की को अपनी क्षमता साबित करने के लिए एक मौके की तलाश थी, जहां उन्हें देश के लिए कुछ करने का मौका मिले। जो उसे 1999 में कारगिल युद्ध के दौरान मिल गया. इस युद्ध के दौरान जब भारतीय सेना को पायलट की जरूरत पड़ी, तब इस युद्ध के दौरान दो महिलाओं गुंजन सक्सेना और श्री विद्या को युद्ध क्षेत्र में भेजने की इज़ाज़त दी गयी .सेना ने इन्हें घायल सैनिकों को लाने के साथ राशन भेजने और सबसे अहम युद्ध क्षेत्र में पाकिस्तानी सैनिकों पर निगाह रखने की जिम्मेदारी सौंपी थी। और यहाँ उनको फाइटर जेट के बदले छोटे चीता हलोकॉप्टर दिये गये ।

बावजूद इसके उन्होंने इस मिशन के लिए हामी भरी और छोटे चीता हेलीकॉप्टर्स से पहली बार युद्ध क्षेत्र की उड़ान भरी। दुश्मन की तोपों और मिसाइलों के सामने चीता हेलीकॉप्टर की कोई औकात नहीं होती क्योंकि वह हथियार रहित होता है। सेल्फ डिफेंस के नाम पर गुंजन के पास केवल एक इंसास राइफल और एक रिवॉल्वर ही थी, जिसका इस्तेमाल उन्हें तब करना था, अगर उनका चॉपर दुश्मन के इलाके में क्रेश हो जाता। दोनों ने जान की परवाह किए बगैर उत्तरी कश्मीर के खतरनाक इलाके में उड़ानें भरी। उस इलाके में पाक सैनिक बुलैट और मिसाइलों से ही एयरफोर्स के हेलीकॉप्टर्स और एयरक्राफ्ट्स को देखते ही निशाना बना रहे थे।

इस दौरान उनका बस केवल एक ही मकसद था कि कैसे घायल सैनिकों को जल्द से जल्द अस्पताल पहुंचाया जाए और यही घायल सैनिक उनके इस जज्बे को भी कायम रखे हुए थे। उन्होंने अपने मिशन को पूरा करने के लिए कई बार लाइन ऑफ कंट्रोल के बिल्कुल नजदीक से भी उड़ान भरी जिससे पाकिस्तानी सैनिकों की पोजिशन का पता लगाया जा सके. इन दोनों महिलाओं ने न केवल कारगिल युद्ध के दौरान दुश्मन की मिसाइलों का मुकाबला किया, बल्कि सरहद पर तैनात जवानों के घायल होने पर उन्हें तुरंत अस्पताल भी पहुंचाया।

कारगिल युद्ध के दौरान गुंजन सक्सेना ने युद्ध क्षेत्र में निडर होकर चीता हेलीकॉप्टर उड़ाया. जिसकी मदद से वह द्रास और बटालिक की ऊंची पहाड़ियों से कई घायल जवानों को उठाकर वापस सुरक्षित स्थान पर लेकर आईं. पाकिस्तानी सैनिक लगातार रॉकेट लॉन्चर और गोलियों से हमला कर रहे थे. गुंजन के एयरक्राफ्ट पर मिसाइल भी दागी गई लेकिन निशाना चूक गया और गुंजन बाल-बाल बचीं. बिना किसी हथियार के गुंजन ने पाकिस्तानी सैनिकों का मुकाबला किया और कई जवानों को वहां से सुरक्षित निकाला। हालांकि बतौर चॉपर पायलट उनके साहस और दिलेरी को देखते हुए उन्हें शौर्य वीर चक्र से भी नवाजा गया। सेना से ऐसा सम्मान प्राप्त करने वाली वह पहली महिला भी बन गईं।

ये लड़की और कोई नहीं बल्कि फ्लाइट लेफ्टिनेंट गुंजन सक्सेना ही थी जिनको कारगिल गर्ल के नाम से भी जाना जाता है।

गुंजन सक्सेना। The Kargil Girl
गुंजन सक्सेना। The Kargil Girl

गुंजन का मानना है कि एक हेलीकॉप्टर के पायलट के लिए इससे अच्छा अहसास क्या हो सकता है कि जंग के दौरान घायलों को अस्पताल पहुंचा रही हैं और किसी की जान बचा रही हैं।

वायुसेना में 7 साल की सर्विस देने के बाद फ्लाइट लेफ्टिनेंट गुंजन सक्सेना अब रिटायर हो चुकी हैं. गुंजन की शादी एक भारतीय वायुसेना के फाइटर पायलट से हुई है। साल 2004 में उन्होंने एक बेटी को भी जन्म दिया , उन्हें कारगिल गर्ल के नाम से भी जाना जाता है। 44 वर्षीय गुंजन सक्सेना वो महिला है जिन्होंने डंके की चोट पर साबित किया कि महिलाएं न सिर्फ पायलट बन सकती है बल्कि जंग के मैदान में अपना लोहा भी मनवा सकती है।

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