गीता vs कुरान जानते हैं किसमें है मानवता का सन्देश

गीता vs कुरान जानते हैं किसमें है मानवता का सन्देश

गीता vs कुरान जानते हैं किसमें है मानवता का सन्देश

अक्सर हमें देखने को मिलता है कि हिन्दू और मुस्लिम आध्यात्मिक ज्ञान को लेकर परिचर्चा ( Debate ) करते रहते हैं। हिन्दू अपनी भगवद्गीता को पवित्र मानते हैं, और मुस्लिम अपनी कुरान को,  ठीक है अपने-अपने धर्म है अपने-अपने मजहब हैं और अपने मजहब के बारे में कोई भी व्यक्ति बुरा नहीं सुनना चाहेगा । लेकिन जब तक  हम Geeta और Quran दोनों को पूरा न पढ़ ले तब तक हम यह decide नहीं कर सकते है कि गीता उत्तम है या कुरान । जब दोनों को पढ़ लेंगे और समझ लेंगे तो तार्किक बुद्धि वाला और Intelligent इंसान समझ जायेगा और आँखों पर पट्टी बांध कर पढने वाले पढने के बाद भी वही के वही रह जायेंगे । आज हम इसी विषय पर यह लेख लिख रहे हैं जिसमें हम गीता और कुरान दोनों में दिए गए सन्देश को पढेंगे, फिर कौन सही है और कौन गलत यह आप लोग ही पढने के बाद खुद decide करें।  तो चलिए पढ़ते हैंगीता vs कुरान जानते हैं किसमें है मानवता का सन्देश ।

गीता vs कुरान जानते हैं किसमें है मानवता का सन्देश –

कुरान 4: 116 – निस्संदेह अल्लाह इस चीज़ को क्षमा नहीं करेगा कि उसके साथ किसी को शामिल किया जाए। हाँ, इससे नीचे दर्जे के अपराध को, जिसके लिए चाहेगा, क्षमा कर देगा। जो अल्लाह के साथ किसी को साझी ठहराता है, तो वह भटककर बहुत दूर जा पड़ा।

गीता 7:21 –  गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं कि जो-जो सकाम भक्त्त जिस-जिस देवता के स्वरूप को श्रद्बा से पूजना चाहता है, उस-उस भक्त्त की श्रद्बा को मैं उसी देवता के प्रति स्थिर करता हूँ ताकि वह खुद को उस विशेष देवता को समर्पित कर सके, हालाँकि उसकी आस्था का फल देने वाला मैं ही होता हूँ


कुरान 6: 102 – वही अल्लाह तुम्हारा रब है, उसके सिवा कोई पूज्य नहीं, हर चीज़ का स्रष्टा है, अतः तुम उसी की बन्दगी करो। वही हर चीज़ का ज़िम्मेदार है।

गीता 7:22 – ऐसी  श्रद्धा से समन्वित वह पुरुष  देवता विशेष की पूजा करने का यत्न करता है और अपनी इच्छा की पूर्ति करता है । किन्तु वास्तविकता तो यह है कि ये सारे लाभ केवल मेरे द्वारा प्रदत्त हैं । यानि जो जिस भी देवता की पूजा करेगा भगवान् श्री कृष्ण उसी देवता में उस भक्त की आस्था स्थिर कर देते हैं और उसी देवता के रूप में भक्त को आस्थानुसार फल देते हैं ।


कुरान 3: 110 – जिन लोगों ने अल्लाह के मुक़ाबले में इनकार की नीति अपनाई है, न तो उनके माल उनके कुछ काम आएँगे और न उनकी संतान ही। और वही हैं जो आग (जहन्नम) का ईधन बनकर रहेंगे।

गीता 6:32 – हे अर्जुन ! जो योगी अपनी भाँति समस्त प्राणियों में सम ( Equal ) देखता है और सुख अथवा दु:ख को भी सबमें  एक सामान देखता है, और दूसरों की पीड़ा समझता है, वह योगी परम श्रेष्ठ माना गया है।


कुरान 65: 5 – यह अल्लाह का आदेश है जो उसने तुम्हारी ओर उतारा है। और जो कोई अल्लाह का डर रखेगा उससे वह उसकी बुराइयाँ दूर कर देगा और उसके प्रतिदान को बड़ा कर देगा ।

गीता 18:66 – तू चिन्ता मत कर, सम्पूर्ण धर्मों को अर्थात् सम्पूर्ण कर्तव्य कर्मों को मुझ में त्याग कर तू केवल एक मुझ सर्व शक्त्तिमान् सर्वाधार परमेश्वर की ही शरण में आ जा । मैं तुझे सम्पूर्ण पापों से मुक्त्त कर दूंगा।


कुरान 72: 23 – सिवाय अल्लाह की ओर से पहुँचाने और उसके संदेश देने के। और जो कोई अल्लाह और उसके रसूल की अवज्ञा करेगा तो उसके लिए जहन्नम की आग है, जिसमें ऐसे लोग सदैव रहेंगे।

गीता 9:29 – मै सब भूतो ( प्राणियों ) मे सम भाव से व्यापक हूँ, न कोई मेरा अप्रिय है और न प्रिय है, परन्तु जो भक्त्त मुझको प्रेम से भजते है, वे मुझ मे है और मै भी उनमे प्रत्यक्ष प्रकट हूँ।


कुरान 3 : 85 – जो इस्लाम के अतिरिक्त कोई और दीन (धर्म) तलब करेगा तो उसकी ओर से कुछ भी स्वीकार न किया जाएगा। और आख़िरत में वह घाटा उठानेवालों में से होगा।

गीता 18:6 –  इसलिये हे पार्थ! इन यज्ञ, दान और तपरूप कर्मों को तथा और भी सम्पूर्ण कर्तव्य कर्मों को आसक्ति और फलों का त्याग करके अवश्य करना चाहिये, यह मेरा निश्चय किया हुआ उत्तम मत है ।


कुरान 9 : 5  फिर, जब हराम (प्रतिष्ठित) महीने बीत जाएँ तो मुशरिकों को जहाँ कहीं पाओ क़त्ल करो, उन्हें पकड़ो और उन्हें घेरो और हर घात की जगह उनकी ताक में बैठो। फिर यदि वे तौबा कर लें और नमाज़ क़ायम करें और ज़कात दें तो उनका मार्ग छोड़ दो, निश्चय ही अल्लाह बड़ा क्षमाशील, दयावान है।

गीता 18: 6 – हे अर्जुन ! जो भक्त्त मुझे जिस प्रकार भजते हैं, मैं भी उन को उसी प्रकार भजता हूँ, क्योंकि सभी मनुष्य सब प्रकार से मेरे ही मार्ग का अनुसरण करते हैं ।

गीता 4: 7 – हे भारत ! जब-जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्बि होती है, तब-तब मैं अपने रूप को रचता हूँ अर्थात् साकार रूप से लोगों के सम्मुख प्रकट होता हूँ।


कुरान 9 : 23 – ऐ ईमान लानेवालो! अपने बाप और अपने भाइयों को अपने मित्र न बनाओ यदि ईमान के मुक़ाबले में कुफ़्र उन्हें प्रिय हो। तुममें से जो कोई उन्हें अपना मित्र बनाएगा, तो ऐसे ही लोग अत्याचारी होंगे।

गीता 4: 7 –  हे अर्जुन ! शरीर रूप यन्त्र में आरूढ़ हुए सम्पूर्ण प्राणियों को अन्तर्यामी परमेश्वर अपनी  माया से उनके कर्मों के अनुसार भ्रमण करता हुआ सब प्राणियों के हृदय में स्थित है। और श्रीकृष्ण और सुदामा  की मित्रता खुद मित्रता प्रेम की एक बड़ी मिसाल है ।


कुरान के reference – Quraninhindi.com

गीता के reference – Thegitahindi.com

आपकी क्या राय है इन आयतों और श्लोको के बारे में अपने विचार नीचे comment में जरुर प्रस्तुत करें और पूरी गीता और पूरी कुरान पढने के लिए उपर दिए गए reference पर जाएँ । और ऐसी अन्य जानकारी पढने के लिए नीचे दिए गए links पर जाएँ –

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