Future और Option क्या होता है।

Future और Option क्या होता है।

Future क्या होता है ?

फ्यूचर्स की ट्रेडिंग एक्सचेंज में होती है। इसे डेरिवेटिव भी कहते हैं। इसके तहत अंडरलाइंग एसेट को भविष्य की किसी तारीख को पहले से तय कीमत पर खरीदने या बेचने की सुविधा मिलती है। अंडरलाइंग एसेट से मतलब किसी खास फ्यूचर से जुड़ा एसेट है। शेयर बाजार के मामले में अंडरलाइंग एसेट किसी कंपनी का शेयर होगा।

कमोडिटी बाजार के फ्यूचर्स के मामले में अंडरलाइंग एसेट कोई कमोडिटी होगी।

2. फ्यूचर कॉन्ट्रैक्ट के साथ ट्रेडिंग यूनिट, न्यूनतम ऑर्डर साइज और क्ववालिटी का उल्लेख होता है। इसके बाद ही एक्सचेंज में फ्यूचर्स कॉन्ट्रैक्ट होगा।

3. फ्यूचर कॉन्टैक्ट के लिए एक्सचेंज कानूनी प्लेटफॉर्म का काम करता है। सौदे करने वाले दोनों पक्षों (खरीदने वाले और बेचने वाले) को एक्सेंज को मार्जिन का भुगतान करना पड़ता है।यह मार्जिन यह सुनिश्चित करता है कि वे भविष्य में इस सौदे को पूरा करेंगे। यह भी पढ़ें : रुपये में कमजोरी से आपके लिए ये चीजें होंगी महंगी

4.फ्यूचर्स कीमतें रोजाना बदलती रहती हैं, इसलिए मार्जिन और कीमतों में अंतर का निपटारा रोजाना करना पड़ता है।

5.फ्यूचर्स कॉन्ट्रैक्ट एक खास वर्ग की जरूरते पूरी करता है। इस सौदे से भविष्य में कीमतों में होने वाली संभावित तेजी या मंदी से सुरक्षा मिलती है।

ऑप्शन क्या होते हैं ?

Option दो प्रकार के होते हैं Call और Put जिनको हम नीचे विस्तार से समझते हैं –

Future और Option क्या होता है।
Future और Option क्या होता है।

कॉल ऑप्शन: कॉल ऑप्शन ऐसा अनुबंध है जो निवेशक को एक निश्चित समय सीमा के भीतर निश्चित कीमत पर एक परिसंपत्ति में कॉल खरीदने का अधिकार देता है। पहले से तय कीमत को स्ट्राइक प्राइस कहा जाता है, जिसे समाप्ति तिथि के रूप में जाना जाता है। कॉल ऑप्शन आपको 100 शेयर खरीदने की अनुमति देता है। अनुबंध की अवधि समाप्त होने से पहले आप लाभ या हानि पर कॉल ऑप्शन बेच सकते हैं। सामान्यतः इसका इस्तेमाल तब होता है जब निवेशक को लगता है कि किसी कमोडिटी में तेजी पर दांव लगाना चाहिए। इसमें प्रीमियम भरना होता, जहां निवेशक का अधिकतम नुकसान होता है।

पुट ऑप्शन: पुट ऑप्शन कॉल ऑप्शन के विपरीत है, यह धारक को शेयर खरीदने का अधिकार देता है। पुट ऑप्शन समापन दिनांक या उसके पहले स्ट्राइक मूल्य पर धारक को अंतर्निहित शेयर बेचने का अधिकार प्रदान करते हैं। इसका इस्तेमाल तब होता है जब निवेशक को लगता है कि बाजार में आगे मंदी के आसार हैं। ऐसे में वह अपनी जरूरत के मुताबिक या तो बाजार से एग्जिट करता है, या ज्यादा खरीदी करता है।

ये कैसे काम करते हैं ?

मान लेते हैं कि 21 दिसंबर को ट्रेडर निफ्टी की 10,800 की एक कॉल खरीदता है। इसकी मियाद 27 दिसंबर को खत्म होनी है। मान लीजिए कि कॉल के हर एक शेयर की कीमत 62 रुपये है।

एक कॉन्ट्रैक्ट में 75 शेयर होते हैं। मान लेते हैं कि 27 दिसंबर को निफ्टी 10,900 रुपये पर बंद होता है। इस तरह 10,800 की कॉल में 100 रुपये को ‘इन द मनी’ कहा जाएगा। इसमें कॉल बेचने वाला ट्रेडर को 100 रुपये के अनुपात में भुगतान करेगा। यानी ट्रेडर को 62 रुपये के हर शेयर पर 38 रुपये का फायदा होगा। यह कुल निवेश पर रिटर्न का 61 फीसदी है।

अब मान लेते हैं कि निफ्टी 10,800 की बजाय 10,700 पर बंद होता है। इस मामले में 10,800 रुपये की कॉल में 100 रुपये को ‘आउट ऑफ द मनी’ कहेंगे। इसमें कॉल खरीदने वाला बिक्री करने वाले के हाथ पूरे के पूरे प्रीमियम (62 रुपये) की रकम गंवा देगा।

यही बात पुट के लिए भी लागू होती है। बस अंतर यह है कि इसमें निफ्टी के गिरने पर खरीदार को फायदा होगा। वहीं, निफ्टी के बढ़ने पर विक्रेता प्रीमियम को रख लेगा।


 यह  भी पढ़े –

शेयर बाजार क्या है ?

SIP क्या है हिंदी में जाने ?

10 बिज़नस आईडिया, जीरो इन्वेस्टमेंट से शुरू कर सकते हैं

Google Adsense क्या है और इससे पैसे कैसे कमायें पूरी जानकारी

Share post, share knowledge

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *