बाइबिल की सच्चाई पर एक नज़र।

बाइबिल की सच्चाई पर एक नज़र।

अक्सर मैंने कई लोगों को यह कहते हुए सुना है कि भगवदगीता, क़ुरान और बाइबिल में एक ही बात कही गई है तो फिर आपस में क्यों लड़ रहे हो। लेकिन यह बात भी सच है कि ऐसी व्यर्थ की बाते सिर्फ वह इंसान कह सकता है जिसने इन तीनो किताबों को ज़िन्दगी में कभी पढ़ा ही नहीं। मैं किसी के साथ लड़ने के लिए नहीं कह रहा हूँ, लेकिन इन ग्रंथो में अंतर समझने को कह रहा हूँ क्योंकि बाइबिल और क़ुरान काफी हद तक एक जैसी हैं लेकिन भगवदगीता और इन दोनों ग्रंथो में जमीन आसमान का फर्क है। इसलिए बिना पढ़े और समझे किसी एक को सही या गलत ठहरना ठीक नहीं  पहले खुद पढ़ें और समझे फिर आपको अपने आप पता चला जायेगा। इसलिए बाइबिल की सच्चाई पर एक नज़र।डालके देखते हैं। आइये बाइबिल के अध्याय 1 का तर्कपूर्ण विश्लेषण करते हैं और समझते हैं।

बाइबिल की सच्चाई पर एक नज़र।


 बाइबिल की सच्चाई पर एक नज़र।

उत्पत्ति | अध्याय 1 | 

1 आदि में परमेश्वर ने आकाश और पृथ्वी की सृष्टि की। 

आकाश और पृथ्वी बना तो ली थी लेकिन कैसे बनायीं , इसको बनाने का क्या कारण था, पहले आकाश बना या पृथ्वी इसका कुछ पता नहीं, बाकि ग्रहों का भी अभी तक कुछ पता नहीं  खैर छोडो आगे बढ़ते हैं ?

और पृथ्वी बेडौल और सुनसान पड़ी थी; और गहरे जल के ऊपर अन्धियारा था: तथा परमेश्वर का आत्मा जल के ऊपर मण्डलाता था। 

यहाँ पर कहा गया है कि परमेश्वर का आत्मा जल के ऊपर मण्डलाता था अब दो सवाल उठते हैं कि –

  1. गहरा जल होता है पृथ्वी में, लेकिन जब पृथ्वी और जल नहीं था तब परमेश्वर का आत्मा कहाँ था ?
  2. जब परमेश्वर का आत्मा है तो इस प्रकार तो वह जीव जंतु हो गया क्योंकि आत्मा जीव जन्तुओ का होता है।  जो सृष्टि का रचनाकार है, जो सभी आत्माओं को उत्पन्न करने वाला होता है उसको आत्मा नहीं बल्कि परमात्मा (परम +आत्मा ) कहलाता हैं। इस प्रकार ईसाईयों के परमेश्वर की भी एक आत्मा है इस से सिद्ध होता है कि वह आत्मा ही है परमात्मा नहीं।

तब परमेश्वर ने कहा, उजियाला हो: तो उजियाला हो गया। 

वाह जी वाह ! परमेश्वर ने कहा उजियाला हो जा और उजियाला हो गया। चलो एक पल के लिए हम मान भी लेते हैं, लेकिन बिना किसी Light Source के कैसे उजाला हो सकता है।  खैर यह कोई इसे नहीं जानता, आगे बढ़ते हैं।

और परमेश्वर ने उजियाले को देखा कि अच्छा है; और परमेश्वर ने उजियाले को अन्धियारे से अलग किया। 

पहले उजियाला किया और फिर कहा कि अच्छा है, अगर वह ईश्वर है तो फिर देखकर अच्छा है कहने की क्या जरुरत थी ? क्या परमेश्वर पहले से नहीं जानता था कि  उजियाला कैसा होता है और अगर वह पहले से नहीं जनता था तो फिर जिसे भूत भविष्य का पता ना हो वह परमेश्वर हरगिज़ नहीं हो सकता। और दूसरी बात भला उजियाले को अंधियारे से कैसे अलग किया जा सकता है ? अगर प्रकाश किसी Light Source से आती तो निश्चित उसका प्रकाश एक सीमा तक जाता उस से अधिक नहीं। ऐसे में प्रकाश को अलग करने का कोई मतलब ही नहीं बनता, क्योंकि वह स्वतः अलग हो जायेगा। वैसे तो प्रकाश बिना किसी  Light Source  के उत्पन्न नहीं किया जा सकता पर फिर भी थोड़ी देर के लिए हम मानते हैं की ईसाईयों के खुदा ने बिना किसी Light Source के ईश्वरीय शक्ति से प्रकाश उत्पन्न किया भी तो वह limited रहा होगा यानी एक निश्चित दूरी तक फैला होगा, उसके बाद अँधियारा ही रहा होगा तो ऐसे में भी प्रकाश और अंधकार को अलग करने की जरुरत नहीं थी, और अगर वह प्रकाश (अनंत तक ) Unlimited यानी सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में फैला तो फिर प्रकाश के सामने अँधेरा किया ही नहीं जा सकता। और आज भी आधे से अधिक ब्रह्माण्ड में अँधेरा क्यों है ?

और परमेश्वर ने उजियाले को दिन और अन्धियारे को रात कहा। तथा सांझ हुई फिर भोर हुआ। इस प्रकार पहिला दिन हो गया। 

अभी तक सूर्य भी नहीं बना, पृथ्वी ने घूमना भी शुरु नहीं किया, और ईसाईयों के खुदा का दिन, रात, सुबह, शाम और पहला दिन भी हो गया । मैं आपसे पूछता हूँ कि बिना सूरज के और बिना पृथ्वी के घूर्णन के दिन, रात, सुबह, शाम का होना संभव है ?

फिर परमेश्वर ने कहा, जल के बीच एक ऐसा अन्तर हो कि जल दो भाग हो जाए।
तब परमेश्वर ने एक अन्तर करके उसके नीचे के जल और उसके ऊपर के जल को अलग अलग किया; और वैसा ही हो गया। 
और परमेश्वर ने उस अन्तर को आकाश कहा। तथा सांझ हुई फिर भोर हुआ। इस प्रकार दूसरा दिन हो गया॥ 

यानी पानी के दो टुकड़े कर दिए एक टुकड़े को ऊपर किया और दूसरे को नीचे और उसके बीच वाले हिस्से को आकाश कहा। अब मैं आपसे पूछता हूँ कि जब बाइबिल की सबसे पहली लाइन में लिखा हुआ है कि आदि में परमेश्वर ने आकाश और पृथ्वी की सृष्टि की तो फिर यहाँ दुबारा आकाश बनाने की जरुरत क्या थी। और पहली बात तो यह है की जबतक आकाश नहीं होगा तब तक जल हो ही नहीं सकता क्योंकि जल को रहने के लिए आकाश (Space) चाहिए बिना आकाश के भला जल कहाँ पर ठहरेगा। अगर पहले आकाश और फिर पानी आने की बात होती तो हम मान भी लेते लेकिन यहाँ तो पहले पानी आया और फिर आकाश और एक आकाश होने के बाद भी दूसरा अकाश।  इस से यह सिद्ध हो गया की बाइबिल ईश्वरीय किताब तो दूर की बात यह किसी विद्वान द्वारा भी रचित नहीं लगती।

फिर परमेश्वर ने कहा, आकाश के नीचे का जल एक स्थान में इकट्ठा हो जाए और सूखी भूमि दिखाई दे; और वैसा ही हो गया।
10 और परमेश्वर ने सूखी भूमि को पृथ्वी कहा; तथा जो जल इकट्ठा हुआ उसको उसने समुद्र कहा: और परमेश्वर ने देखा कि अच्छा है। 

भला परमेश्वर को किसी काम को करने के लिए कहने की क्या जरुरत ही क्या है वह कोई इंसान थोड़ी न है ? खैर,
पृथ्वी पूरी ( Earth ) को कहा जाता है सिर्फ सूखी भूमि को नहीं, बाइबिल की पहली लाइन में खुद कहा गया है।
फिर से वही बात कि परमेश्वर ने देखा कि अच्छा है यह कैसा परमेश्वर है जिसको भूत भविष्य का पता नहीं है, क्या परमेश्वर को पता नहीं था कि पृथ्वी में जल और भूमि कैसी दिखेगी या कैसी दिखती है जो उसे बनाने के बाद ही पता चलता है, की अच्छा है। यह प्रवृत्ति तो इंसानो की है कि जब हम किसी पेंटिंग को बनाते हैं तब पता चलता हैं की अच्छी है या ख़राब।

11 फिर परमेश्वर ने कहा, पृथ्वी से हरी घास, तथा बीज वाले छोटे छोटे पेड़, और फलदाई वृक्ष भी जिनके बीज उन्ही में एक एक की जाति के अनुसार होते हैं पृथ्वी पर उगें; और वैसा ही हो गया। 
12 तो पृथ्वी से हरी घास, और छोटे छोटे पेड़ जिन में अपनी अपनी जाति के अनुसार बीज होता है, और फलदाई वृक्ष जिनके बीज एक एक की जाति के अनुसार उन्ही में होते हैं उगे; और परमेश्वर ने देखा कि अच्छा है।13 तथा सांझ हुई फिर भोर हुआ। इस प्रकार तीसरा दिन हो गया

पहले तो ईश्वर कह रहा और चीजें चुटकी में होती जा रही हैं जादू की तरह जिसका। इसका कोई प्रूफ नहीं है कि यह सत्य है, फिर हम कैसे विश्वाश कर ले कि बिना किसी कारण के कुछ भी चुटकी में हो गया और फिर इसको बनाने के बाद परमेश्वर कह रहा है कि अच्छा है ? और बिना सूरज, चन्द्रमा, पृथ्वी के घूर्णन के तीसरा दिन भी हो गया, मैं आपसे पूछता हूँ कि आखिर कैसे ?

14 फिर परमेश्वर ने कहा, दिन को रात से अलग करने के लिये आकाश के अन्तर में ज्योतियां हों; और वे चिन्हों, और नियत समयों, और दिनों, और वर्षों के कारण हों। 
15 और वे ज्योतियां आकाश के अन्तर में पृथ्वी पर प्रकाश देने वाली भी ठहरें; और वैसा ही हो गया। 

परमेश्वर ने कहा, दिन को रात से अलग करने के लिये आकाश के अन्तर में ज्योतियां हों। फिर कर दी न अज्ञानियों वाली बात, जब पांचवी लाइन  (जब पहला दिन, रात हुआ ) में परमेश्वर ने उजियाले को दिन और अन्धियारे को रात कहा तो इस प्रकार तो उसी वक़्त दिन और रात अलग हो गए थे तो फिर  दुबारा दिन और रात को अलग करने की भला क्या जरुरत है। इस से एक बार फिर सिद्ध होता है कि बाइबिल (bible) न तो ईश्वरोक्त किताब है और न ही इस किताब में बताया जाने वला परमेश्वर।

16 तब परमेश्वर ने दो बड़ी ज्योतियां बनाईं; उन में से बड़ी ज्योति को दिन पर प्रभुता करने के लिये, और छोटी ज्योति को रात पर प्रभुता करने के लिये बनाया: और तारागण को भी बनाया।
17 परमेश्वर ने उन को आकाश के अन्तर में इसलिये रखा कि वे पृथ्वी पर प्रकाश दें, 
18 तथा दिन और रात पर प्रभुता करें और उजियाले को अन्धियारे से अलग करें: और परमेश्वर ने देखा कि अच्छा है। 

अब चाँद तारे बन गए हैं, जिनको बड़ी ज्योति और छोटी ज्योति कहा गया है, और तारागण भी हैं।  वैसे तो सूर्य भी तारागण (Stars) में ही आता है लेकिन मैं इसपर ज्यादा नहीं कहूंगा आप समझदार हैं। लेकिन जो 17 वीं लाइन में कहा गया है कि वे पृथ्वी पर प्रकाश दें, इस से मुझे कुछ गड़बड़ लगता है। क्योंकि परमेश्वर ने तो तीसरी लाइन में कहा था कि उजियाला हो: तो उजियाला हो गया । अब फिर से पृथ्वी पर प्रकाश दने के लिए इनको बनाने की आवश्यकता ही क्या थी जब पहले से परमेश्वर ने प्रकाश बनाया था। यहाँ पर पुनः अज्ञानियों वाली बात कर दी, उजियाला और अँधियारा को अलग करने की, फिर वही बात की अच्छा है, ईश्वर सर्वव्यापक, सर्वशक्तिमान होता है, उसको Past, Present, Future का सब पता होता है कि कब, क्यों, कैसा, किसलिए होगा। तो फिर ईश्वर बनाने के बाद क्यों कहेगा कि अच्छा है ?

19 तथा सांझ हुई फिर भोर हुआ। इस प्रकार चौथा दिन हो गया॥ 
20 फिर परमेश्वर ने कहा, जल जीवित प्राणियों से बहुत ही भर जाए, और पक्षी पृथ्वी के ऊपर आकाश के अन्तर में उड़ें। 
21 इसलिये परमेश्वर ने जाति जाति के बड़े बड़े जल-जन्तुओं की, और उन सब जीवित प्राणियों की भी सृष्टि की जो चलते फिरते हैं जिन से जल बहुत ही भर गया और एक एक जाति के उड़ने वाले पक्षियों की भी सृष्टि की: और परमेश्वर ने देखा कि अच्छा है। 

पहले तो यह बात ही अविश्वश्नीय लगती है कि परमेश्वर को बस यह कहने की देरी होती है कि हो जा !और अकारण ही सब कुछ हो जाता है, फिर परमेश्वर देखता है की अच्छा है वाली बात संदेह उत्पन्न करती है।

22 और परमेश्वर ने यह कहके उनको आशीष दी, कि फूलो-फलो, और समुद्र के जल में भर जाओ, और पक्षी पृथ्वी पर बढ़ें। 
23 तथा सांझ हुई फिर भोर हुआ। इस प्रकार पांचवां दिन हो गया। 
24 फिर परमेश्वर ने कहा, पृथ्वी से एक एक जाति के जीवित प्राणी, अर्थात घरेलू पशु, और रेंगने वाले जन्तु, और पृथ्वी के वनपशु, जाति जाति के अनुसार उत्पन्न हों; और वैसा ही हो गया। 
25 सो परमेश्वर ने पृथ्वी के जाति जाति के वन पशुओं को, और जाति जाति के घरेलू पशुओं को, और जाति जाति के भूमि पर सब रेंगने वाले जन्तुओं को बनाया: और परमेश्वर ने देखा कि अच्छा है। 

यहाँ भी बस परमेश्वर ने यह कहा कि हो जा और वह सब हो गया।  और फिर परमेश्वर ने देखा कि अच्छा है।
26 फिर परमेश्वर ने कहा, हम मनुष्य को अपने स्वरूप के अनुसार अपनी समानता में बनाएं; और वे समुद्र की मछलियों, और आकाश के पक्षियों, और घरेलू पशुओं, और सारी पृथ्वी पर, और सब रेंगने वाले जन्तुओं पर जो पृथ्वी पर रेंगते हैं, अधिकार रखें। 
27 तब परमेश्वर ने मनुष्य को अपने स्वरूप के अनुसार उत्पन्न किया, अपने ही स्वरूप के अनुसार परमेश्वर ने उसको उत्पन्न किया, नर और नारी करके उसने मनुष्यों की सृष्टि की। 
28 और परमेश्वर ने उन को आशीष दी: और उन से कहा, फूलो-फलो, और पृथ्वी में भर जाओ, और उसको अपने वश में कर लो; और समुद्र की मछलियों, तथा आकाश के पक्षियों, और पृथ्वी पर रेंगने वाले सब जन्तुओ पर अधिकार रखो। 
29 फिर परमेश्वर ने उन से कहा, सुनो, जितने बीज वाले छोटे छोटे पेड़ सारी पृथ्वी के ऊपर हैं और जितने वृक्षों में बीज वाले फल होते हैं, वे सब मैंने तुम को दिए हैं; वे तुम्हारे भोजन के लिये हैं: 
30 और जितने पृथ्वी के पशु, और आकाश के पक्षी, और पृथ्वी पर रेंगने वाले जन्तु हैं, जिन में जीवन के प्राण हैं, उन सब के खाने के लिये मैं ने सब हरे हरे छोटे पेड़ दिए हैं; और वैसा ही हो गया। 
31 तब परमेश्वर ने जो कुछ बनाया था, सब को देखा, तो क्या देखा, कि वह बहुत ही अच्छा है। तथा सांझ हुई फिर भोर हुआ। इस प्रकार छठवां दिन हो गया। 

अध्याय 2 

1 यों आकाश और पृथ्वी और उनकी सारी सेना का बनाना समाप्त हो गया। 
और परमेश्वर ने अपना काम जिसे वह करता था सातवें दिन समाप्त किया। और उसने अपने किए हुए सारे काम से सातवें दिन विश्राम किया। 

वह परमेश्वर भी भला कैसा परमेश्वर जिसको 6 दिन दुनिया बनाने के बाद थकान लग गयी हो और वह विश्राम करने लग गया हो। इस बात को सुनकर तो हंसी भी आती है।

  • जब परमेश्वर शक्तिमान है तो उसको विश्राम करने की क्या जरुरत ?
  • अगर परमेश्वर अपने हाथ पैरो से यह सब करता तो विश्राम की जरुरत भी थी। लेकिन सिर्फ हो जा कहने से ही जिस परमेश्वर को विश्राम करने की जरुरत पड़े फिर तो वह तो शक्तिमान नहीं बल्कि शक्तिहीन है एक बच्चे से भी कम शक्ति वाला।
  • हंसना, रोना,सोना,विश्राम  करना, थकना, शोक करना, पछताना, ये सब तो जीव जंतुओं  के आचरण में होता है ना कि इनको बनाने वाले ईश्वर के।  ओर अगर ईसाईयों के खुदा यहोवा को को भी इन सब की अनुभूति होती है तो फिर तो वह एक सामान्य इंसान के जैसा ही हुआ परमेश्वर कहाँ रहा।

आगे भी सारी बाइबिल ऐसी बातों से भरी पड़ी है जिसको पढ़कर एक समझदार व्यक्ति आसानी से समझ सकता है कि बाइबिल की सच्चाई क्या है इसमें क्या लिखा है।

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