भावेश भाटिया | Blind bhavesh bhatiya’s Success story

bhavesh bhatiya

आज हम आपको एक ऐसी शकसियत से परिचित करवाने जा रहे हैं जिन्होंने अपनी कड़ी लगन और मेहनत के दम पर ये साबित कर दिखाया की दुनिया में कुछ भी नामुनकिन नहीं । जी हाँ हम बात कर रहे हैं Bhavesh bhatiya जी की जो आज Sunrise Candles company के मालिक हैं जिस कंपनी की turn over आज  25 crore रुपये है लेकिन यहाँ तक भावेश जी का ये संघर्षमयी सफ़र कैसा था वो जानते हैं ।

परिचय

भावेश भाटिया जी का पूरा नाम भावेश चंदुभाई भाटिया है जिनका जन्म गुजरात के कच्छ जिले के अंजर गाँव में हुआ था । जहाँ वो अपनी माँ जो बचपन से ही कैंसर से पीड़ित थी और पिता जी guest house में काम करते थे । जब 1956 में गुजरात में एक भूकंप आया तो उस वक़्त भाटिया जी का परिवार गुजरात से महाबलेश्वेर शिफ्ट हो गए था। भाटिया जी जन्म से नेत्रहीन नहीं थे बल्कि retina muscular deterioration बीमारी के शिकार थे और 20 साल की उम्र में इनकी आँखों की रौशनी चली गयी।20 साल की उम्र में जब आँखों की रौशनी पूरी तरह से चली गयी तो तब उन्हें  नौकरी से भी हाथ धोना पड़ा और इसी वक़्त माँ भी भगवान को प्यारी हो गयीं  और भावेश जी का साथ छोड़ दिया और तब  शुरू हुआ भावेश जी का संघर्ष।आगे बढ़ने से पहले आपको बता दे की वो अपनी प्रेरणा का श्रोत अपनी माँ को ही मानते हैं और कहते हैं की –

“मै अपनी माँ के बिना बेसहारा हो गया,वो उतनी पढ़ी लिखी तो नहीं थी लेकन मुझे पढ़ने के लिए उन्होंने कड़ी मेहनत करी है जब मै ब्लैक बोर्ड पर लिखा हुआ नहीं पढ़ पाता था तब भी वो मेरे साथ घंटो बैठती थीं और उन्होंने मेरी पोस्ट ग्रेजुएशन तक ऐसा जारी रखा। “

वे बताते हैं की उनकी माँ ने ही उन्हें प्रेरित किया है और अपनी माँ के द्वारा कही बात जब उन्होंने कही तो भावेश क्या कोई भी इस बात से प्रेरित हो सकता है क्यूंकि वो बात ये थी कि-

तुम दुनिया नहीं देख सकते तो क्या हुआ,कुछ ऐसा करो की तुमको दुनिया देखे।

और शायद यही वो बात थी जो भावेश जी को प्रेरित करने के लिए काफी थी।

शुरुवात और संघर्ष

नौकरी छूटने के बाद भावेश जी ने  1999 में National Institute of blind से 4 महीने का मोमबत्ती बनाने का कोर्स किया और acupressure therapy का कोर्स भी किया अब कोर्स तो कर लिया था पर मन में तो कुछ बड़ा बनने की अपना business शुरू करने की चाह थी मगर पैसो की किल्लत के कारण वे अपना business शुरू नहीं कर पाए । अब पैसा जुटाने के लिए उन्हें मह्बलेश्वेर के होटलों में acupressure ttherapist का काम शुरू किया जिस से कुछ पैसे बचने लगे अब बचे हुए पैसो से वो कैंडल की समग्री और कैंडल को बनने वाला सांचा ले आये जिसके बाद उन्होंने घर पर ही मोमबती बनाकर उसे holly cross church के सामने 2*2 की टेबल पर बेचना शुरू कर दिया था । इस तरह वे थोडा बहुत तो कमा लेते मगर कुछ बड़ा करने के लिए फिर भी पैसो की जरूरत थी जो उनके पर अभी भी पर्याप्त नहीं था किसी से उम्मीद करते मगर जब वक़्त ही ऐसा होता है तब साथ भी कौन देता है।

अब मिला सहारा-

जब वो अपनी ठेली लगाया करते थे तब उनकी ठेली पर एक लड़की आई और भावेश जी से बात करने लगी ।जिनकी  बाते,विचार,व्यवहार भाटिया जी को पसंद आने लगा वह लड़की हैं नीता । इसी तरह  धीरे-धीरे दोनों में दोस्ती हो गयी  और ये दोस्ती कब प्यार में बदल गयी उन्हें पता भी नहीं चला मगर समस्या यह थी की अब दोनों ने एक दुसरे को पसंद तो कर लिया मगर नीता के घरवाले इस बात से बिलकुल राज़ी नहीं थे की उसकी शादी भावेश जी से हो । मगर नीता ने अपने घरवालो की एक न सुनी और और भावेश जी से शादी करने का फैसला लिया और उनकी इसी सच्ची श्रधा की वजह से उनकी उनकी शादी हुई और आज वो पति पत्नी के रूप में एक खुशाल जीवन जी रहे हैं ।

दो जिस्म एक जान बनकर करी मेहनत

शादी के बाद भी हालत गरीबी के ही थे मगर नीता ने कभी न कोई शिकायत की और न ही किसी बात पर ऐतराज़ जताया बल्कि उनके मोमबत्ती के छोटे से व्यापार को आगे बढाने के लिए उनके साथ कन्धा से कन्धा मिलाकर काम किया।कुछ दिनों बाद नीता ने पैसे जुटाकर एक दुपहिये वाली गाडी खरीदी और भावेश जी के साथ जगह जगह जाकर मोमबत्ती बेचना शुरू किया । अक्सर नीता उन्हें बाज़ार ले जाती और उन्हें विभिन्न प्रकार की डिजाइनिंग वाली  मोम्बतियो के बारे में बताती जिसे वो छू कर महसूस करते और घर पर आकार उस से अछि मोमबती बनने की कोशिस करते और उनकी यह कड़ी मेहनत सफल भी हुई ।जब यह कारोबार चलने लगा तो मदद के लिए NBA द्वारा उनको 15000 रुपये की मदद दी गयी।अब यहाँ से हालत थोड़ी बेहतर गयी ।

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अब कभी पीछे मुड़कर  नहीं देखा-

जबतक आप अपनी कुशलता से आगे नहीं आते तब तक आपको कोई नहीं देखता मगर जब आप मेहनत से आगे आते है तो एक फिर भगवन भी आपकी मदद करने के लिए तैयार हो जाता है इसी तरह हुआ कुछ भावेश जी के साथ भी । नीता का साथ और अपनी कुशलता के दम पर भावेश यहाँ तक पहुचे तो उनके दो दोस्त उनकी मदद के लिए आगे आये जीने से एक ने उनके लिए वेबसाइट www.sunrisecandles.in बनायीं जिस पर Bhavesh bhatiya की सभी तरह की मोमबत्तियो को दिखाया और  इसी के फिर उस वेबसाइट से उनके पास बड़े बड़े आर्डर आने लग गए।साथ ही दुसरे बिल्डर दोस्त ने candle center खोलने के लिए  एक जगह दिलाई और काम सही से चलने लगा ।अब ज्यादा आर्डर e कारण उनपर काम का बोझ बढ़ने लगा तो उन्हें और लोगो की भी जरूरत पड़ी । फिर उन्होंने यह फैसला किया की वो अपने पास सिर्फ नेत्रहीनो को ही रखेंगे और उनको भी यह काम सिखायेंगे  जिस से उनकी ज़िन्दगी सुधर सके और वे आत्मनिर्भर होकर खुशाल ज़िन्दगी जियें । और जब काम अच्छा चलने लगा तो उन्होंने sunrise candle के नाम से अपनी कैंडल कम्पनी की स्थापना की जहा आज 200 से ज्यादा नेत्रहीन काम करते हैं ।

पुरूस्कार-

Bhavesh bhatiya जी सत्यमेव जयते शो में जा चुके हैं ।

National award for best self Employed {2014}

best handicraft award {2010}

piloo d khambatta award for best blind entrepreneur NAB {2009}

best blind self employment award {2008}

ashavadi trophy rotary club {2006}

 

सनराइज कैंडल कम्पनी-

सनराइज कैंडल कंपनी आज 25 करोड़ रुपये की कंपनी है जिसमे 200 से ज्यादा नेत्रहीन लोग काम करते हैं ।यहाँ आपको

Pillar Candles, floating Candles,Unique Novelty Candles,Gel Candles,Toy shaped Candles,Fruit Basket Candles,Traditional,Candles मिल जायेंगी । Reliance Iindustry,narad Iindustry,rotary club और बिग बाज़ार जैसी कंपनिया सनराइज कैंडल के clint हैं ।

भावेश जी मोम्बतियो का रॉ मटेरियल उत्तराखंड से खरीदते हैं।

भावेश जी का यह जीवन यह तो साबित करता ही है की दुनिया में करने वाले कुछ भी कर सकते हैं साथ ही साथ एक बहुत बड़ी प्रेरणा भी मिलती है

उनके उस जज्बे को हमारा सलाम ।

|जय हिन्द |

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