आत्मा क्या है ?

आत्मा क्या है ?

आत्मा के बारे में सबसे प्रमाणिक उल्लेख भगवदगीता में मिलता है। कहा गया है कि आत्मा अविनाशी है , इस पर किसी भी प्राकृतिक भाव का असर नहीं होता। आत्मा पर किसी भी प्रकार की चीजें असर नहीं करती। आत्मा का एक ही स्वाभाविक गुण है , स्वाभाविक रूप से प्रसार करना और ईश्वर में विलीन होना जब तक आत्मा ईश्वर के अपने मुख्य बिंदु तक नहीं पहुंचती, तब तक आत्मा  शरीर बदलता रहता है।

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कई लोग मन और आत्मा को एक मान लेते हैं लेकिन इन दोनों में जमीन आस्मान का अंतर है। मन और आत्मा अलग अलग वस्तु है इस संसार में तीन तरह के पदार्थ हैं । ईश्वर जीव और प्रकृति इनको बनाने वाला कोई नहीं है जीव आत्मा को कहते हैं ईश्वर और आत्मा दोनों चेतन पदार्थ हैं और प्रकृति जड़ है। मन प्रकृति से ही बना है इसलिए मन को भी जड़ कहा जाता है क्योंकि प्रकृति भी जड़ है अब मन और आत्मा को समझने से पहले हमें जड़ और चेतन पदार्थों को समझना होगा कि जड़ और चेतन क्या होता है। आप यह अनुभव कर सकते हैं कि आप एक मनुष्य हैं यानी आप खुद को फील कर सकते हैं लेकिन एक पत्थर अपने आप को फील नहीं कर सकता पानी अपने आप को फील नहीं कर सकता इसलिए यह जड़ पदार्थ हुए, और आप स्वयं को फील कर सकते हैं इसलिए आप एक चेतन पदार्थ हुए। आत्मा एक चेतन पदार्थ होता है जिसका गुण है इच्छा राग द्वेष सुख-दुख ज्ञान प्रयतन विवेक और निर्णय मन एक जड़ पदार्थ है जिसे चेतन आत्मा चलाता है। मन प्रकृति के तीन तत्वों से मिलकर बना होता है सत्व गुण तम गुण और रजोगुण मन प्रकृति से बना होता है। इसलिए इन तीनों गुणों की प्रधानता मन में होती है। मन एक दर्पण की तरह है जिसके द्वारा आत्मा बाहर के पदार्थों के संपर्क में आता है जब बाहर के पदार्थों के चित्र मन पर पड़ते हैं तो मन के द्वारा ही आत्मा इन सब चीजों को देखता है । और एक साधन और होता है मन के साथ जिसे चित कहते हैं। इस चित में बाहर की जो चीजें मन के द्वारा आत्मा देखता रहता है वह सेव होती रहती है और जिन्हें स्मृतियां कहते हैं। और यही स्मृतियां आगे चलकर मनुष्य का ज्ञान बन जाती है। इसी ज्ञान के अनुसार मनुष्य अपना निर्णय लेता है।


!! जय श्री कृष्ण !!

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