भगवद्गीता के १० सबसे जबरदस्त श्लोक

श्रीमद भगवद गीता क्या है ? और हमारे लिए कितनी महत्वपूर्ण है

श्रीमद भगवद्गीता आज अपने परिचय के लिए किसी के शब्दों की मोहताज नहीं है, क्योंकि पूरी दुनिया आज भगवदगीता को जानती है।  विज्ञान का जैसे जैसे विकास हो रहा है वैसे ही बाकि मजहबो की किताबो का महत्व दिन प्रतिदिन घटता जा रहा है, लेकिन भगवद्गीता विज्ञान पर खरी उतरती जा रही है और दिन प्रतिदन अपनी एक अलग पहचान बना रही है। भगवद्गीता सिर्फ हिन्दुओ के लिए नहीं है बल्कि इसको कोई भी पढ़ सकता है और इसके ज्ञान को कोई भी अपना सकता है और इसमें जितनी भी बाते हैं वह 100 % सत्य हैं इसलिए पढ़ने वाले के दिलो में भगवद्गीता एक महत्वपूर्ण जगह बना देती है। इस बात पर हम सभी भारतीयों को गर्व होना चाहिए कि भगवान् श्रीकृष्ण ने भारत की इस पवन भूमि पर अपना जन्म लिया और हमको इतना अनमोल तोहफा (भगवद गीता ) दी। भगवद गीता एक मात्रा ऐसी पुस्तक है जिसमे दिये गए ज्ञान पर समय जगह और परिस्थिति का कोई प्रभाव नहीं पड़ता।  श्रीमद भगवद्गीता  का ज्ञान जितना एप्लीकेबल भारत में है, उतना ही अमेरिका में, उतना ही चीन में,  उतना ही रूस में, और उतना ही पाकिस्तान में भी। यह ज्ञान उतना ही एप्लीकेबल लड़कियों पर है और उतना ही लड़को पर, उतना ही जवानो पर और उतना ही बूढ़ो पर। किसी भी वर्ण का, किसी भी मजहब का, किसी भी दीन, का और कैसे भी हो सब पर एक जैसा एप्लीकेबल है। यह सबसे बड़ा प्रमाण है कि गीता का ज्ञान कितना महान है।  आइये जानते है भगवद्गीता के १० सबसे जबरदस्त श्लोक जो आपकी ज़िन्दगी में हर दिन काम आ सकते हैं।

श्रीमद भगवद गीता क्या है ? और हमारे लिए कितनी महत्वपूर्ण है


1 –

न जायते म्रियते वा कदाचिन्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः ।
अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे ॥2.10॥

भावार्थ :- यह आत्मा किसी काल में भी न तो जन्मता है और न मरता ही है तथा न यह उत्पन्न होकर फिर होने वाला ही है क्योंकि यह अजन्मा, नित्य, सनातन और पुरातन है, शरीर के मारे जाने पर भी यह नहीं मारा जाता।


2 –

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन ।
मा कर्मफलहेतुर्भुर्मा ते संगोऽस्त्वकर्मणि ॥2.47॥

भावार्थ :- तेरा कर्म करने में ही अधिकार है, उसके फलों में कभी नहीं। इसलिए तू फल की इच्छा त्याग कर अपना कर्म कर तथा ऐसा भी मत सोच कि मैं कर्म क्यों करूँ।


3 –

ध्यायतो विषयान्पुंसः संगस्तेषूपजायते ।
संगात्संजायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते ॥2.62॥

क्रोधाद्‍भवति सम्मोहः सम्मोहात्स्मृतिविभ्रमः ।
स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति ॥2.63॥

भावार्थ :- विषयों (जिनसे चीजों से बहुत ज्यादा लगाव हो जाता है ) का चिन्तन करने वाले पुरुष की उन विषयों में आसक्ति (Attachment) हो जाती है, आसक्ति से उन विषयों की कामना (पाने की इच्छा) उत्पन्न होती है, और कामना में विघ्न पड़ने से क्रोध उत्पन्न होता है, क्रोध से अत्यन्त मूढ़ भाव उत्पन्न हो जाता है, मूढ़ भाव से स्मृति में भ्रम हो जाता है, स्मृति में भ्रम हो जाने से बुद्धि अर्थात ज्ञानशक्ति का नाश हो जाता है और बुद्धि का नाश हो जाने से यह पुरुष अपनी स्थिति से गिर जाता है।


4 –

कर्मेन्द्रियाणि संयम्य य आस्ते मनसा स्मरन्‌ ।
इन्द्रियार्थान्विमूढात्मा मिथ्याचारः स उच्यते ॥3.6॥
यस्त्विन्द्रियाणि मनसा नियम्यारभतेऽर्जुन ।
कर्मेन्द्रियैः कर्मयोगमसक्तः स विशिष्यते॥3.7॥
नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः।
शरीरयात्रापि च ते न प्रसिद्धयेदकर्मणः॥3.8॥
भावार्थ :- जो मूढ़ बुद्धि मनुष्य समस्त इन्द्रियों को हठपूर्वक ऊपर से रोककर मन से उन इन्द्रियों के विषयों का चिन्तन करता रहता है, वह मिथ्याचारी अर्थात दम्भी कहा जाता है, किन्तु हे अर्जुन! जो पुरुष मन से इन्द्रियों को वश में करके अनासक्त हुआ समस्त इन्द्रियों द्वारा कर्मयोग का आचरण करता है, वही श्रेष्ठ है। तू शास्त्रविहित कर्तव्यकर्म कर क्योंकि कर्म न करने की अपेक्षा कर्म करना श्रेष्ठ है तथा कर्म न करने से तेरा शरीर-निर्वाह भी नहीं सिद्ध होगा।


5 –

चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः ।
तस्य कर्तारमपि मां विद्धयकर्तारमव्ययम्‌ ॥4.13
भावार्थ :-  ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र- इन चार वर्णों का समूह, गुण और कर्मों के विभागपूर्वक मेरे द्वारा रचा गया है। इस प्रकार उस सृष्टि-रचनादि कर्म का कर्ता होने पर भी मुझ अविनाशी परमेश्वर को तू वास्तव में अकर्ता ही जान।
|| जिसको ईश्वर का ज्ञान होता है या जो शिक्षक या गुरु का कार्य करता है वह ब्राह्मण होता चाहे वह कही किसी भी वर्ण में पैदा क्यों न हो।  जो रक्षक का कार्य करता है वह क्षत्रिय है चाहे वह किसी भी वर्ण में पैदा हो।  जो कृषि गौ पालन अदि का काम करता है वह वैस्य वैश्य है।  और जो अपनी आजीविका चलाने के लिए इन तीनो वर्णो की सेवा करता है वह शूद्र है चाहे वह ब्राह्मण के घर में ही क्यों न पैदा हुआ हो।  लेकिन आज के मुर्ख लोक इस वर्ण जो जाती समझ बैठे हैं और जो जिस घर में पैदा होता है उसको उसी जाति का मान लेते हैं जिस से भेद भाव पैदा होता है। जबकि यह श्रीकृष्ण ने कर्म और गुणों को देखकर वर्णो को डिवाइड किया है,  न कि किसी की जात या उसका घर देखकर। इसलिए जातियां इंसानो ने स्वयं बनाई है भगवान ने नहीं।

6  –

न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते ।
तत्स्वयं योगसंसिद्धः कालेनात्मनि विन्दति ॥4.38 

भावार्थ :-  इस संसार में ज्ञान के समान पवित्र करने वाला निःसंदेह कुछ भी नहीं है। उस ज्ञान को कितने ही काल से कर्मयोग द्वारा शुद्धान्तःकरण हुआ मनुष्य अपने-आप ही आत्मा में पा लेता है।


7   –

यो न हृष्यति न द्वेष्टि न शोचति न काङ्‍क्षति।
शुभाशुभपरित्यागी भक्तिमान्यः स मे प्रियः ॥12 .17 ॥
समः शत्रौ च मित्रे च तथा मानापमानयोः।
शीतोष्णसुखदुःखेषु समः सङ्‍गविवर्जितः॥12 .18 ॥

तुल्यनिन्दास्तुतिर्मौनी सन्तुष्टो येन केनचित्‌।
अनिकेतः स्थिरमतिर्भक्तिमान्मे प्रियो नरः॥12 .19 ॥

भावार्थ :- जो न कभी हर्षित होता है, न द्वेष करता है, न शोक करता है, न कामना करता है तथा जो शुभ और अशुभ सम्पूर्ण कर्मों का त्यागी है- वह भक्तियुक्त पुरुष मुझको प्रिय है। जो शत्रु-मित्र में और मान-अपमान में सम है तथा सर्दी, गर्मी और सुख-दुःखादि द्वंद्वों में सम है और आसक्ति से रहित है। जो निंदा-स्तुति को समान समझने वाला, मननशील और जिस किसी प्रकार से भी शरीर का निर्वाह होने में सदा ही संतुष्ट है और रहने के स्थान में ममता और आसक्ति से रहित है- वह स्थिरबुद्धि भक्तिमान पुरुष मुझको प्रिय है।


7 –

त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः।
कामः क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत्त्रयं त्यजेत्‌॥16.21
भावार्थ :-  काम, क्रोध तथा लोभ- ये तीन प्रकार के नरक के द्वार ( सर्व अनर्थों के मूल और नरक की प्राप्ति में हेतु होने से यहाँ काम, क्रोध और लोभ को ‘नरक के द्वार’ कहा है) आत्मा का नाश करने वाले अर्थात्‌ उसको अधोगति में ले जाने वाले हैं। अतएव इन तीनों को त्याग देना चाहिए।


8 –

मत्तः परतरं नान्यत्किञ्चिदस्ति धनञ्जय ।
मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव ॥7.7 

भावार्थ :-  हे धनंजय! मुझसे भिन्न दूसरा कोई भी परम कारण नहीं है। यह सम्पूर्ण जगत सूत्र में सूत्र के मणियों के सदृश मुझमें गुँथा हुआ है


9 –

यो यो यां यां तनुं भक्तः श्रद्धयार्चितुमिच्छति ।
तस्य तस्याचलां श्रद्धां तामेव विदधाम्यहम्‌ ॥7.21 ৷৷
स तया श्रद्धया युक्तस्तस्याराधनमीहते ।
लभते च ततः कामान्मयैव विहितान्हि तान्‌ ॥7.22 ৷৷
भावार्थ :-  जो-जो सकाम भक्त जिस-जिस देवता के स्वरूप को श्रद्धा से पूजना चाहता है, उस-उस भक्त की श्रद्धा को मैं उसी देवता के प्रति स्थिर करता हूँ, वह पुरुष उस श्रद्धा से युक्त होकर उस देवता का पूजन करता है और उस देवता से मेरे द्वारा ही विधान किए हुए उन इच्छित भोगों को निःसंदेह प्राप्त करता है।


10  –

अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते ।
तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्‌ ॥9.22॥

भावार्थ :- जो अनन्यप्रेमी भक्तजन मुझ परमेश्वर को निरंतर चिंतन करते हुए निष्कामभाव से भजते हैं, उन नित्य-निरंतर मेरा चिंतन करने वाले पुरुषों का योगक्षेम (भगवत्‌स्वरूप की प्राप्ति का नाम ‘योग’ है और भगवत्‌प्राप्ति के निमित्त किए हुए साधन की रक्षा का नाम ‘क्षेम’ है) मैं स्वयं प्राप्त कर देता हूँ।


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