डॉ. भीमराव आम्बेडकर

डॉ. भीमराव आम्बेडकर
डॉ. भीमराव आम्बेडकर
डॉ. भीमराव आम्बेडकर

प्रारंभिक जीवन-

भीमराव आम्बेडकर जी का जन्म 14 अप्रैल 1891 को मध्यप्रदेश (ब्रिटिश भारत का मध्य भारत प्रान्त) में स्थित महू नगर के सैन्य छावनी में हुआ था। उनके पिता का नाम रामजी मालोजी सकपाल और माता का नाम भीमाबाई था।उनके बचपन का नाम भीवा था और वे अपने माता पिता की 14 वीं व अंतिम संतान थे। उनका परिवार मराठी मूल का था , तथा वे वर्तमान के महाराष्ट्र के रत्नागिरी जिले में स्थित आम्बडवे गॉव के निवासी थे। आंबेडकर जी हिन्दू महार जाति के थे जो उस समय अछूत मानी जाती थी ,जिस कारण आम्बेडकर जी और उनक परिवार को समाज में गहन भेदभाव का सामना करना पड़ता था। भीमराव आम्बेडकर जी के पूर्वज काफी लम्बे समय से ब्रिटिश ईस्ट इंडिया की सेना में कार्यरत थे। और उनक पिता श्री रामजी सकपाल , भारतीय सेना की महू छावनी में सेवारत थे तथा सेना में काम करते करते वे सूबेदार के पद तक पहुँच चुके थे।

भीमराव को बचपन से ही पढ़ने का और नये ज्ञान को अर्जित करने का बहुत सौक था , और उन्हें समाज की कुरीतियों के विषय में उतना ज्ञान नहीं था , किन्तु समाज में उन्हें अपनी जाति के कारण बहुत बार अपमान व भेदभाव सहन करना पड़ता था। विद्यालय की पढाई में सक्षम और कुशाग्र होने के बावजूद उन्हें छुआछूत के कारण  बहुत कठिनाई और अपमान का सामना करना पड़ता था। 7 नवम्बर 1900 को भीमराव के पिता रामजी सकपाल ने सातारा की गवर्न्मेण्ट हाइस्कूल में अपने बेटे भीमराव का नाम भिवा रामजी आंबडवेकर (भीवा-भीमराव के बचपन का नाम ) दर्ज कराया।
आम्बेडकर का मूल उपनाम सकपाल की बजाय “आंबडवेकर” लिखवाया था, जो कि उनके आंबडवे गाँव से संबंधित था। क्योंकि कोंकण प्रांत के लोग अपना उपनाम गाँव के नाम से रखते थे, इसीलिए भीवा आम्बेडकर के आंबडवे गाँव से सम्बंधित होने से आंबडवेकर उपनाम स्कूल में लिखवाया गया। बाद में एक देवरुखे ब्राह्मण शिक्षक कृष्णा महादेव आंबेडकर (जो भीमराव से विशेष स्नेह रखते थे,) ने उनके नाम से ‘आंबडवेकर’ हटाकर अपना सरल ‘आंबेडकर’ उपनाम भीमराव के नाम के बाद जोड़ दिया। तब से आज तक वे आम्बेडकर नाम से जाने जाते हैं।
रामजी सकपाल परिवार के साथ बंबई (अब मुंबई) चले आये। अप्रैल 1906 में, जब भीमराव लगभग 15 वर्ष आयु के थे, तो नौ साल की लड़की रमाबाई से उनकी शादी कराई गई थी। तब वे पांचवी अंग्रेजी कक्षा पढ रहे थे। उन दिनों भारत में बाल-विवाह का प्रचलन था।

भीमराव आम्बेडकर की शिक्षा

प्राथमिक शिक्षा

आंबेडकर ने अपनी अंग्रेजी की पहली कक्षा के लिए 7 नवंबर 1900 में सातारा शहर के राजवाड़ा चौक पर स्थित गवर्न्मेण्ट हाईस्कूल (अब प्रतापसिंह हाईस्कूल)  में प्रवेश लिया। उनके विद्यालयी और शैक्षिक जीवन की शुरुआत उसी दिन से शुरू होगयी , इसलिए  महाराष्ट्र में 7 नवंबर को विद्यार्थी दिवस रूप में मनाया जाता हैं। विद्यार्थी जीवन में भीमराव का नाम  ‘भिवा’ था। स्कूल में उस समय ‘भिवा रामजी आंबेडकर’ यह उनका नाम उपस्थिति पंजिका में क्रमांक – 1914 पर अंकित था। भीमराव जब  अंग्रेजी चौथी कक्षा की परीक्षा में पास हुए , तब उनकी इस सफलता को अछूतों के बीच सार्वजनिक समारोह के रूप में मनाया गया , क्योंकि अछूत जाति के लोगों के बीच यह बात असामान्य थी। इसीलिए भीमराव को खूब सम्मान दिया गया और उनके परिवार के मित्र एवं लेखक दादा केलुस्कर द्वारा खुद की लिखी ‘बुद्ध की जीवनी’ उन्हें भेंट दी गयी। इसे पढकर उन्होंने पहली बार गौतम बुद्ध व बौद्ध धर्म को जाना एवं उनकी शिक्षा से प्रभावित हुए।

माध्यमिक शिक्षा

भीमराव आम्बेडकर अपने परिवार के साथ सन 1897 में मुंबई चले गए। उन्होंने एल्फिंस्टोन रोड पर स्थित गवर्न्मेंट हाईस्कूल में एड्मिशन लिया और आगे की शिक्षा प्राप्त की। 

स्नातक स्तर की शिक्षा

भीमराव ने सन 1907 में मेट्रिक की परीक्षा पास की और उस वर्ष उन्होंने एल्फिंस्टन कॉलेज में प्रवेश किया, जो कि बॉम्बे विश्वविद्यालय से संबद्ध था। भीमराव अपने समुदाय में स्नातक की शिक्षा प्राप्त करने वाले पहले व्यक्ति थे।

उन्होंने 1912 तक ,बॉम्बे विश्वविद्यालय से अर्थशास्त्र और राजनीतिक विज्ञान में कला स्नातक (बी॰ए॰) की शिक्षा प्राप्त की, और उसके उपरान्त वे बड़ौदा राज्य सरकार के साथ काम करने लगे। उनकी पत्नी ने अभी अपने नये परिवार को स्थानांतरित कर दिया था और काम शुरू किया जब उन्हें अपने बीमार पिता को देखने के लिए मुंबई वापस लौटना पड़ा, जिनका 2 फरवरी 1913 को निधन हो गया।

स्नाकोत्तर शिक्षा

कोलम्बिया विश्व विद्यालय में शिक्षा

22 वर्ष की आयु में आम्बेडकर 1913 में संयुक्त राज्य अमेरिका चले गए ,जहां उन्हें सयाजीराव गायकवाड़ तृतीय (बड़ौदा के गायकवाड़) द्वारा स्थापित एक योजना के तहत न्यूयॉर्क शहर में स्थित कोलंबिया विश्वविद्यालय में स्नातकोत्तर शिक्षा के अवसर प्रदान करने के लिए तीन साल के लिए 11.50 डॉलर प्रति माह बड़ौदा राज्य की छात्रवृत्ति प्रदान की गई थी। वहां पहुँचने के तुरन्त बाद वे लिविंगस्टन हॉल में पारसी मित्र नवल भातेना के साथ रहने लगे । जून 1915 में उन्होंने अपनी कला स्नातकोत्तर (एम॰ए॰) परीक्षा पास की, जिसमें अर्थशास्त्र प्रमुख विषय, और समाजशास्त्र, इतिहास, दर्शनशास्त्र और मानव विज्ञान यह अन्य विषय थे। उन्होंने स्नातकोत्तर के लिए प्राचीन भारतीय वाणिज्य विषय पर शोध कार्य प्रस्तुत किया। आम्बेडकर जॉन डेवी और लोकतंत्र पर उनके काम से प्रभावित थे।

लन्दन स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स विश्वविद्यालय में शिक्षा

भीमराव  अक्टूबर 1916  में  लंदन चले गये और वहाँ उन्होंने ग्रेज इन बैरिस्टर कोर्स (विधि अध्ययन) के लिए प्रवेश लिया, और साथ ही लंदन स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स में भी प्रवेश लिया जहां उन्होंने अर्थशास्त्र की डॉक्टरेट (Doctorate) थीसिस पर काम करना शुरू किया। जून 1917 में, भीमराव ने विवश होकर अपना अध्ययन अस्थायी रूप से बीच में ही छोड़ दिया ,और भारत लौट आए क्योंकि बड़ौदा राज्य से उनकी छात्रवृत्ति समाप्त हो गई थी। लौटते समय उनके पुस्तक संग्रह को उस जहाज से अलग जहाज पर भेजा दिया  गया था जिसे जर्मन पनडुब्बी के टारपीडो द्वारा डुबो दिया गया। ये प्रथम विश्व युद्ध का काल था। उन्हें चार साल के भीतर अपने थीसिस के लिए लंदन लौटने की अनुमति मिली। भीमराव,बड़ौदा राज्य के सेना सचिव के रूप में काम करने लगे किन्तु अचानक अपने जीवन में फिर से आये भेदभाव से डॉ॰ भीमराव आम्बेडकर निराश हो गये और उन्होंने अपनी नौकरी छोड़ दी और उसके बाद एक निजी ट्यूटर और लेखाकार के रूप में काम करने लगे।

यहाँ तक कि उन्होंने अपना परामर्श व्यवसाय भी आरम्भ किया जो उनकी सामाजिक स्थिति के कारण विफल रहा। अपने एक अंग्रेज जानकार मुंबई के पूर्व राज्यपाल लॉर्ड सिडनेम के कारण उन्हें मुंबई के सिडनेम कॉलेज ऑफ़ कॉमर्स मे राजनीतिक अर्थव्यवस्था के प्रोफेसर के रूप में नौकरी मिल गयी। 1920 में कोल्हापुर के शाहू महाराज ,अपने पारसी मित्र के सहयोग और कुछ निजी बचत के सहयोग से भीमराव एक बार फिर से इंग्लैंड वापस जाने में सफ़ल हो पाए , तथा 1921 में विज्ञान स्नातकोत्तर (एम॰एससी॰) प्राप्त की, जिसके लिए उन्होंने ‘प्रोवेन्शियल डीसेन्ट्रलाईज़ेशन ऑफ इम्पीरियल फायनेन्स इन ब्रिटिश इण्डिया’ (ब्रिटिश भारत में शाही अर्थ व्यवस्था का प्रांतीय विकेंद्रीकरण) खोज ग्रन्थ प्रस्तुत किया था। 1922 में, उन्हें ग्रेज इन ने बैरिस्टर-एट-लॉज डिग्री प्रदान की और उन्हें ब्रिटिश बार में बैरिस्टर के रूप में प्रवेश मिल गया। 1923 में, उन्होंने अर्थशास्त्र में डी॰एससी॰ (डॉक्टर ऑफ साईंस) उपाधि प्राप्त की। उनकी थीसिस “दी प्राब्लम आफ दि रुपी: इट्स ओरिजिन एंड इट्स सॉल्यूशन” (रुपये की समस्या: इसकी उत्पत्ति और इसका समाधान) पर थी। लंदन का अध्ययन पूर्ण कर भारत वापस लौटते हुये भीमराव आम्बेडकर तीन महीने जर्मनी में रुके, जहाँ उन्होंने अपना अर्थशास्त्र का अध्ययन, बॉन विश्वविद्यालय में जारी रखा। किंतु समय की कमी से वे विश्वविद्यालय में अधिक नहीं ठहर सकें। उनकी तीसरी और चौथी डॉक्टरेट्स (एलएल॰डी॰, कोलंबिया विश्वविद्यालय, 1952 और डी॰लिट॰, उस्मानिया विश्वविद्यालय, 1953) सम्मानित उपाधियाँ थीं।

छुआछूत के विरुद्ध संघर्ष

हिन्दू जाति प्रथा में दलितों (जिन लोगो को दबाया गया हो समाजिक, राजनैतिक, आर्थिक और शैक्षिक रूप से) को समाज से पृथक करके रखा जाता था। उन लोगों को सार्वजनिक नदी, तालाब और सड़कें इस्तेमाल करने की मनाही थी। अगस्त 1923 को बॉम्बे लेजिस्लेटिव कौंसिल के द्वारा एक प्रस्ताव लाया गया, कि वो सभी जगह जिनका निर्माण और देखरेख सरकार करती है, ऐसी जगहों का इस्तमाल हर कोई कर सकता है। जनवरी 1924 में, महाड जोकि बॉम्बे कार्यक्षेत्र का हिस्सा था। उस अधिनियम को नगर निगम परिषद के द्वारा लागु किया गया। लेकिन सवर्णवादीयो के विरोध के कारण इसे अमल में नहीं लाया जा सका।

आम्बेडकर का कहना था कि “छुआछूत गुलामी से भी बदतर है।आम्बेडकर बड़ौदा के रियासत राज्य द्वारा पढ़े थे ,अतः वह राज्य की सेवा करने के लिए बाध्य थे। आम्बेडकर को  महाराजा गायकवाड़ का सैन्य सचिव नियुक्त किया गया था , किन्तु  जातिगत भेदभाव के कारण होने वाले छुआछूत से वह बहुत दुःखी होगये और उन्हें वो नौकरी छोड़नी पड़ी। उन्होंने अपने जीवन में होने वाली इस प्रकार की घटनाओं का वर्णन अपनी आत्मकथा,”वोटिंग फॉर अ वीजा ” में  किया। इसके बाद, उन्होंने अपने बढ़ते परिवार के लिए जीविका साधन खोजने के पुनः प्रयास किये, जिसके लिये उन्होंने लेखाकार के रूप में, व एक निजी शिक्षक के रूप में भी काम किया, और एक निवेश परामर्श व्यवसाय की स्थापना की, किन्तु जब उनके निवेशकों और ग्राहकों को पता चला कि वे अछूत हैं तो उनकी सारी मेहनत विफल होगयी । 1918 में, ये मुंबई में सिडेनहम कॉलेज ऑफ कॉमर्स एंड इकोनॉमिक्स में राजनीतिक अर्थशास्त्र के प्रोफेसर बने। हालांकि वे छात्रों के साथ सफल रहे, फिर भी अन्य प्रोफेसरों ने उनके साथ उठने  बैठने तथा  पानी पीने के बर्तन साझा करने पर विरोध किया।
आंबेडकर को ‘सॉउथबरो समिति'( जो उस समय भारत सरकार अधिनियम 1919 तैयार कर रही थी) के समक्ष ,भारत के एक प्रमुख विद्वान के रूप में साक्ष्य के लिए आमंत्रित किया गया।  इस सुनवाई के दौरान, आम्बेडकर ने दलितों और अन्य धार्मिक समुदायों के लिये पृथक निर्वाचिका और आरक्षण देने की वकालत की।इस विषय में आंबेडकर जी द्वारा अनेक प्रकार के प्रयास किये गए :
सन 1920- आंबेडकर द्वारा बम्बई से , ‘साप्ताहिक मूकनायक’ के प्रकाशन की शुरुआत की गयी। आम्बेडकर ने इसका प्रयोग रूढ़िवादी हिंदू राजनेताओं व जातीय भेदभाव से लड़ने के प्रति भारतीय राजनैतिक समुदाय की अनिच्छा की आलोचना करने के लिये किया।
अछूतो की शिक्षा को बढ़ावा – इसके लिए उनका पहला संगठित प्रयास केंद्रीय संस्थान बहिष्कृत हितकारिणी सभा की स्थापना था, जिसका उद्देश्य शिक्षा और सामाजिक-आर्थिक सुधार को बढ़ावा देने के साथ ही अवसादग्रस्त वर्गों के रूप में सन्दर्भित “बहिष्कार” के कल्याण करना था। दलित अधिकारों की रक्षा के लिए, उन्होंने मूकनायक, बहिष्कृत भारत, समता, प्रबुद्ध भारत और जनता जैसी पांच पत्रिकाएं निकालीं।
सन 1925 – अम्बेडकर को  बम्बई ‘प्रेसीडेंसी समिति’ में सभी यूरोपीय सदस्यों वाले ‘साइमन कमीशन’ में काम करने के लिए नियुक्त किया गया।
1 जनवरी 1927 – इस दिन आंबेडकर द्वारा आंग्ल-मराठाद्वितीय युद्ध के अन्तर्गत 1  जनवरी 1818 को हुई कोरेगाँव की लड़ाई के दौरान मारे गये भारतीय महार सैनिकों के सम्मान में  कोरेगाँव विजय स्मारक (जयस्तंभ) में एक समारोह आयोजित किया। यहाँ महार समुदाय से संबंधित सैनिकों के नाम संगमरमर के एक शिलालेख पर खुदवाये गये तथा कोरेगाँव को दलित स्वाभिमान का प्रतीक बनाया।’महार’, महाराष्ट्र राज्य और आसपास के राज्यों में रहने वाला  एक सामाजिक समूह है।   महार,चमार और जाटव इन तिन्हाे समूह में सब लाेग बाैद्ध धर्मिय बन गए है। महाराष्ट्र की कुल जनसंख्या के 18% लोग बौद्ध है। सभी महार आज लगभग बौद्ध बन चूके है। महाराष्ट्र में बौद्ध एवं महार कुल जनसंख्या के 20% है। श्री आर. वी. रसेल के अनुसार महाराष्ट्र का सबसे संभावित अर्थ महारों का राष्ट्र (महार राष्ट्र) होना प्रतीत होता है। सम्पूर्ण महार समूह २०वी सदीं में डॉ॰ बाबासाहेब आंबेडकर द्वारा अपनाये गए बौद्ध धर्म का अनुसरण करता है।
सन 1927 – इस वर्ष तक डॉ॰ आम्बेडकर ने छुआछूत के विरुद्ध एक व्यापक एवं सक्रिय आंदोलन आरम्भ करने का निर्णय किया। उन्होंने सार्वजनिक आंदोलनों, सत्याग्रहों और जलूसों के द्वारा, पेयजल के सार्वजनिक संसाधन समाज के सभी वर्गों के लिये खुलवाने के साथ ही उन्होनें अछूतों को भी हिंदू मन्दिरों में प्रवेश करने का अधिकार दिलाने के लिये संघर्ष किया। उन्होंने महाड शहर में अछूत समुदाय को भी शहर की चवदार तालाब से पानी लेने का अधिकार दिलाने कि लिये सत्याग्रह चलाया।इसे महाड सत्याग्रह के नाम से जाना गया।
25 दिसंबर 1927 -इस दिन को,आम्बेडकर  ने  हजारों अनुयायियों के नेतृत्व में मनुस्मृति की प्रतियों को जलाया। इसकी स्मृति में प्रतिवर्ष 25 दिसंबर को मनुस्मृति दहन दिवस के रूप में आम्बेडकरवादियों और हिंदू दलितों द्वारा मनाया जाता है।
सन 1930 – डॉ. आम्बेडकर ने तीन महीने की योजना  के बाद कालाराम मन्दिर सत्याग्रह शुरू किया। कालाराम मन्दिर आंदोलन में लगभग 15,000 स्वयंसेवक एकत्रित  हुए, जिससे नाशिक की सबसे बड़ी प्रक्रियाएं हुईं। जुलूस का नेतृत्व एक सैन्य बैंड ने किया था, स्काउट्स का एक बैच, महिलाएं और पुरुष पहली बार भगवान को देखने के लिए अनुशासन, आदेश और दृढ़ संकल्प में चले गए थे। जब वे द्वार तक पहुँचे, तो द्वार ब्राह्मण अधिकारियों द्वारा बंद कर दिए गए।

राजनैतिक जीवन

सन 1926 में डॉ.आंबेडकर का राजनीतिक जीवन शुरू हुआ। और 1956 तक वो राजनीतिक क्षेत्र में विभिन्न पदों पर रहे। दिसंबर 1926 में, बॉम्बे के गवर्नर ने उन्हें बॉम्बे विधान परिषद के सदस्य के रूप में निर्वाचित  किया , उन्होंने अपने कर्तव्यों को गंभीरता से लिया, और अक्सर आर्थिक मामलों पर भाषण दिये। वे 1936 तक बॉम्बे लेजिस्लेटिव काउंसिल के सदस्य थे।

सन 1936 में, डॉ.आम्बेडकर ने स्वतंत्र लेबर पार्टी की स्थापना की, तथा  1937 में इस पार्टी  ने केन्द्रीय विधान सभा चुनावों मे 13 सीटें जीती। इसके पश्चात आम्बेडकर को बॉम्बे विधान सभा के विधायक के रूप में चुना गया था। वह 1942 तक विधानसभा के सदस्य रहे और इस दौरान उन्होंने बॉम्बे विधान सभा में विपक्ष के नेता के रूप में भी कार्य किया।आंबेडकर  ने 15 मई 1936 को अपनी पुस्तक ‘एनीहिलेशन ऑफ कास्ट’ (जाति  प्रथा का विनास ) प्रकाशित की, जो उनके न्यूयॉर्क में लिखे एक शोधपत्र पर आधारित थी। इस पुस्तक में आम्बेडकर ने हिंदू धार्मिक नेताओं और जाति व्यवस्था की जोरदार आलोचना की।

उन्होंने अछूत समुदाय के लोगों को गाँधी द्वारा रचित शब्द हरिजन  पुकारने के कांग्रेस के फैसले की कडी निंदा की। इसके पश्चात , 1955 के बीबीसी साक्षात्कार में, उन्होंने गांधी पर उनके गुजराती भाषा के पत्रों में जाति व्यवस्था का समर्थन करना तथा अंग्रेजी भाषा पत्रों में जाति व्यवस्था का विरोध करने का आरोप लगाया।”ऑल इंडिया शेड्यूल्ड कास्ट्स फेडरेशन” एक सामाजिक-राजनीतिक संगठन था जिसकी स्थापना दलित समुदाय के अधिकारों के लिए अभियान चलाने के लिए 1942 में आंबेडकर द्वारा की गई थी। वर्ष 1942 से 1946 के दौरान, आंबेडकर ने रक्षा सलाहकार समिति और वाइसराय की कार्यकारी परिषद में श्रम मंत्री के रूप में सेवारत रहे।

आम्बेडकर ने अपनी राजनीतिक पार्टी को अखिल भारतीय अनुसूचित जाति फेडरेशन (शेड्युल्ड कास्ट फेडरेशन) में बदलते देखा, हालांकि 1946 में आयोजित भारत के संविधान सभा के लिए हुये चुनाव में उनकी पार्टी ने  खराब प्रदर्शन किया। आम्बेडकर ने उत्तर बॉम्बे में से 1952 का पहला भारतीय लोकसभा चुनाव लड़ा, लेकिन वह , उनके पूर्व सहायक और कांग्रेस पार्टी के उम्मीदवार नारायण काजोलकर से हार गए। 1952 में आम्बेडकर राज्य सभा के सदस्य बन गए। उन्होंने भंडारा से 1954 के उपचुनाव में फिर से लोकसभा में प्रवेश करने की कोशिश की, लेकिन वे तीसरे स्थान पर रहे (कांग्रेस पार्टी जीती)।

आंबेडकर दो बार भारतीय संसद के ऊपरी सदन राज्य सभा में महाराष्ट्र का प्रतिनिधित्व करने वाले भारत की संसद के सदस्य बने थे। राज्यसभा सदस्य के रूप में उनका पहला कार्यकाल 3 अप्रैल 1952 से 2 अप्रैल 1956 के बीच था, और उनका दूसरा कार्यकाल 3 अप्रैल 1956 से 2 अप्रैल 1962 तक आयोजित किया जाना था, लेकिन कार्यकाल समाप्त होने से पहले, 6 दिसंबर 1956 को उनका निधन हो गया।

डॉ. आंबेडकर ने 30 सितंबर 1956 को, “अनुसूचित जाति महासंघ” को खारिज करके “रिपब्लिकन पार्टी ऑफ़ इंडिया” की स्थापना की घोषणा की थी. लेकिन पार्टी का गठन होने से पूर्व ही , 6 दिसंबर 1956 को उनका निधन हो गया। उसके बाद, उनके अनुयायियों और कार्यकर्ताओं ने इस पार्टी के गठन की योजना बनाई। पार्टी की स्थापना के लिए 1 अक्टूबर 1957 को नागपुर में प्रेसीडेन्सी की एक बैठक करवाई गयी थी। इस बैठक में एन॰ शिवराज, यशवंत आंबेडकर, पी॰ टी॰ बोराले, ए॰ जी॰ पवार, दत्ता कट्टी, डी॰ ए॰ रूपवते उपस्थित थे। 3 अक्टूबर 1957 को रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया का गठन किया गया और एन॰ शिवराज को पार्टी के अध्यक्ष के रूप में चुना गया था।

संविधान निर्माण

डॉ. भीमराव आम्बेडकर, गाँधी जी व कांग्रेस के कटु आलोचक थे किन्तु इसके बावजूद आम्बेडकर की प्रतिष्ठा एक अद्वितीय विद्वान और विधिवेत्ता की थी जिसके कारण , 15 अगस्त 1947 में भारत की स्वतंत्रता के बाद, कांग्रेस के नेतृत्व वाली नई सरकार जब अस्तित्व में आई तो उसने आम्बेडकर को देश के पहले क़ानून एवं न्याय मंत्री के रूप में सेवा करने के लिए आमंत्रित किया, और इस आमंत्रण को उन्होंने स्वीकार कर लिया। 29 अगस्त 1947 को, आम्बेडकर को स्वतंत्र भारत के नए संविधान की रचना के लिए बनी संविधान की मसौदा समिति के अध्यक्ष पद पर नियुक्त किया गया।भारतीय संविधान निर्माण में  आंबेडकर का महत्वपूर्ण योगदान है ,उन्ही के द्वारा संविधान निर्माण की भूमिका तथा अवधारणा रखी गयी । इस कार्य में आम्बेडकर का शुरुआती बौद्ध संघ रीतियों और अन्य बौद्ध ग्रंथों का अध्ययन भी काम आया।डॉ. भीमराव आम्बेडकर एक बुद्धिमान व्यक्ति तथा संविधान विशेषज्ञ थे, उन्होंने लगभग 60 देशों के संविधानों का अध्ययन किया था। आम्बेडकर को “भारत के संविधान का पिता” के रूप में भी जाना जाता है। संविधान सभा में, मसौदा समिति के सदस्य टी॰ टी॰ कृष्णामाचारी ने संविधान निर्माण की कोशिशों में जुटे हुए आंबेडकर जी के विषय में कहा  :

“अध्यक्ष महोदय, मैं सदन में मौजूद उन लोगों में से एक हूं, जिन्होंने डॉ॰ आंबेडकर की बात को बहुत ध्यान से सुना है। मैं इस संविधान की ड्राफ्टिंग में जुटे काम और उत्साह के बारे में जानता हूं।” उसी समय, मुझे यह महसूस होता है कि इस समय हमारे लिए जितना महत्वपूर्ण संविधान तैयार करने के उद्देश्य की ओर ध्यान देना आवश्यक था, वह ड्राफ्टिंग कमेटी द्वारा नहीं दिया गया। सदन को शायद सात सदस्यों की जानकारी है। आपके द्वारा नामित, एक ने सदन से इस्तीफा दे दिया था और उसे बदल दिया गया था। एक की मृत्यु हो गई थी और उसकी जगह कोई नहीं लिया गया था। एक अमेरिका में था और उसका स्थान नहीं भरा गया और एक अन्य व्यक्ति राज्य के मामलों में व्यस्त था, और उस सीमा तक एक शून्य था। एक या दो लोग दिल्ली से बहुत दूर थे और शायद स्वास्थ्य के कारणों ने उन्हें भाग लेने की अनुमति नहीं दी। इसलिए अंततः यह हुआ कि इस संविधान का मसौदा तैयार करने का सारा कार्य भार डॉ॰ आंबेडकर पर पड़ा और इस कार्य के लिए  हम उनके आभारी हैं। इस कार्य को प्राप्त करने के बाद मैं ऐसा मानता हूँ कि यह निस्संदेह सराहनीय है।”

आंबेडकर द्वारा तैयार किये गए भारतीय संविधान का वर्णन ” ग्रैनविले ऑस्टिन” ने ‘पहला और सबसे महत्वपूर्ण सामाजिक दस्तावेज’ के रूप में किया।

आम्बेडकर द्वारा तैयार किए गए संविधान के पाठ में व्यक्तिगत नागरिकों के लिए नागरिक स्वतंत्रता की एक विस्तृत श्रृंखला के लिए संवैधानिक गारंटी और सुरक्षा प्रदान की गई है. जिसमें धर्म की आजादी, छुआछूत को खत्म करना, और भेदभाव के सभी रूपों का उल्लंघन करना शामिल है। आम्बेडकर ने महिलाओं के लिए व्यापक आर्थिक और सामाजिक अधिकारों के लिए तर्क दिया, और अनुसूचित जातियों (एससी) और अनुसूचित जनजातियों (एसटी) और अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के सदस्यों के लिए नागरिक सेवाओं, स्कूलों और कॉलेजों में नौकरियों के आरक्षण की व्यवस्था शुरू करने के लिए असेंबली का समर्थन जीता, जो कि सकारात्मक कार्रवाई थी। भारत के सांसदों ने इन उपायों के माध्यम से भारत की निराशाजनक कक्षाओं के लिए सामाजिक-आर्थिक असमानताओं और अवसरों की कमी को खत्म करने की उम्मीद की। संविधान सभा द्वारा 26 नवंबर 1949 को संविधान अपनाया गया था। अपने काम को पूरा करने के बाद, बोलते हुए, आम्बेडकर ने कहा:

मैं महसूस करता हूं कि संविधान, साध्य (काम करने लायक) है, यह लचीला है पर साथ ही यह इतना मज़बूत भी है कि देश को शांति और युद्ध दोनों के समय जोड़ कर रख सके। वास्तव में, मैं कह सकता हूँ कि अगर कभी कुछ गलत हुआ तो इसका कारण यह नही होगा कि हमारा संविधान खराब था बल्कि इसका उपयोग करने वाला मनुष्य अधम था।

अनुच्छेद 370 का विरोध व सामान नागरिक संहिता

भीमराव आम्बेडकर ने भारत के संविधान के अनुच्छेद 370 का विरोध किया, जिसके अनुसार  जम्मू-कश्मीर राज्य को विशेष दर्जा दिया गया था  , और जिसे उनकी इच्छाओं के ख़िलाफ़ संविधान में शामिल किया गया था। आम्बेडकर वास्तव में समान नागरिक संहिता के पक्षधर थे और कश्मीर के मामले में धारा 370 का विरोध करते थे। आम्बेडकर के अनुसार भारत आधुनिक, वैज्ञानिक सोच और तर्कसंगत विचारों का देश होता, उसमें पर्सनल कानून की जगह नहीं होती। संविधान सभा में बहस के दौरान, आम्बेडकर ने एक समान नागरिक संहिता को अपनाने की सिफारिश करके भारतीय समाज में सुधार करने की अपनी इच्छा प्रकट कि। 1951 मे आंबेडकर ने संसद में अपने द्वारा बनाया गया हिन्दू कोड बिल (हिंदू संहिता विधेयक) का मसौदा सबके समक्ष रखा किन्तु सांसदों द्वारा इस बिल पर रोक लगाई लगाई गयी तथा बिल  के रोके जाने के बाद आम्बेडकर ने मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे दिया।

हिंदू कोड बिल के अंतर्गत इस बिल  द्वारा भारतीय महिलाओं को कई प्रकार से स्वतंत्रता के अधिकार प्रदान करने की बात कहीं गई थी। इस मसौदे में उत्तराधिकार, विवाह और अर्थव्यवस्था के कानूनों में लैंगिक समानता की मांग की गयी थी। हालांकि प्रधानमंत्री नेहरू, कैबिनेट और कुछ अन्य कांग्रेसी नेताओं ने इसका समर्थन किया पर राष्ट्रपति राजेन्द्र प्रसाद एवं वल्लभभाई पटेल समेत संसद सदस्यों की एक बड़ी संख्या इसके ख़िलाफ़़ थी। आम्बेडकर ने 1952 में बॉम्बे (उत्तर मध्य) निर्वाचन क्षेत्र में लोक सभा का चुनाव एक निर्दलीय उम्मीदवार के रूप मे लड़ा पर वह हार गये। इस चुनाव में आम्बेडकर को 123,576 वोट तथा नारायण सडोबा काजोलकर को 138,137 वोटों का मतदान किया गया था। मार्च 1952 में उन्हें संसद के ऊपरी सदन यानि राज्य सभा के लिए नियुक्त किया गया और इसके बाद उनकी मृत्यु तक वो इस सदन के सदस्य रहे।

समान नागरिकता कानून के अंतर्गत आने वाले मुख्य विषय ये हैं-

  • संपत्ति के अधिग्रहण और संचालन का अधिकार,
  • व्यक्तिगत स्तर
  • विवाह, तलाक और गोद लेना ।

भारत का संविधान, देश के नीति निर्देशक तत्व में सभी नागरिकों को समान नागरिकता कानून सुनिश्चित करने के प्रति प्रतिबद्धता व्यक्त करता है। हालाँकि इस तरह का कानून अभी तक पूरी तरह से लागू नहीं किया जा सका है। गोवा एक मात्र ऐसा राज्य है जहाँ यह लागू है।

आर्थिक नियोजन

आम्बेडकर विदेश से अर्थशास्त्र में डॉक्टरेट की डिग्री लेने वाले पहले भारतीय थे। उन्होंने तर्क दिया कि औद्योगिकीकरण और कृषि विकास से भारतीय अर्थव्यवस्था में वृद्धि हो सकती है। उन्होंने भारत में प्राथमिक उद्योग के रूप में कृषि में निवेश पर बल दिया। आम्बेडकर के दर्शन ने सरकार को अपने खाद्य सुरक्षा लक्ष्य हासिल करने में मदद की। आम्बेडकर ने राष्ट्रीय आर्थिक और सामाजिक विकास की वकालत की, शिक्षा, सार्वजनिक स्वच्छता, समुदाय स्वास्थ्य, आवासीय सुविधाओं को बुनियादी सुविधाओं के रूप में जोर दिया। उन्होंने साथ  ब्रिटिश शासन की वजह से देश में हुए विकास के पीछे हुए नुक्सान की की भी गणना की।

भारतीय रिज़र्व बैंक

आम्बेडकर को एक अर्थशास्त्री के तौर पर प्रशिक्षण मिला था , और 1921 तक वह एक पेशेवर अर्थशास्त्री बन चूके थे। जब वह एक राजनीतिक नेता बन गए तो उन्होंने अर्थशास्त्र पर तीन विद्वत्वापूर्ण पुस्तकें लिखीं:

  • अ‍ॅडमिनिस्ट्रेशन अँड फायनान्स ऑफ दी इस्ट इंडिया कंपनी।
  • द इव्हॅल्युएशन ऑफ प्रॉव्हिन्शियल फायनान्स इन् ब्रिटिश इंडिआ।
  • द प्रॉब्लम ऑफ द रूपी : इट्स ओरिजिन ॲन्ड इट्स सोल्युशन।

भारतीय रिज़र्व बैंक (आरबीआई),भी भीमराव  आम्बेडकर के विचारों पर आधारित था, जो उन्होंने हिल्टन यंग कमिशन को प्रस्तुत किये थे।

विदेश से अर्थशास्त्र में डॉक्टरेट की डिग्री लेने वाले आंबेडकर पहले भारतीय थे। उन्होंने तर्क दिया कि औद्योगिकीकरण और कृषि विकास से भारतीय अर्थव्यवस्था में वृद्धि हो सकती है। उन्होंने भारत में कृषि को  प्राथमिक उद्योग के रूप में देखा और कृषि में निवेश पर बल दिया।आम्बेडकर के दर्शन ने सरकार को अपने खाद्य सुरक्षा लक्ष्य हासिल करने में मदद की। आम्बेडकर ने राष्ट्रीय आर्थिक और सामाजिक विकास की वकालत की, शिक्षा, सार्वजनिक स्वच्छता, समुदाय स्वास्थ्य, आवासीय सुविधाओं को बुनियादी सुविधाओं के रूप में जोर दिया।

दूसरा विवाह

आम्बेडकर की पहली पत्नी रमाबाई का निधन 1935 में लंबी बीमारी के बाद हुआ । 1940 के दशक के अंत में भारतीय संविधान के मसौदे को पूरा करने के बाद, वह नीन्द की कमी से पीड़ित थे, उनके पैरों में भी बहुत दर्द रहने लगा और वह मधुमेह के रोग से भी पीड़ित होगए। इसलिए  वह इलाज के लिए बॉम्बे (मुम्बई) गए, और वहां डॉक्टर शारदा कबीर से मिले, जिनके साथ आंबेडकर ने  15 अप्रैल 1948 को नई दिल्ली में अपने घर पर विवाह किया था। क्योंकि डॉक्टरों ने ही उन्हें  एक ऐसे जीवन साथी की सलाह दी जो एक अच्छा और रोग के अनुकूल  खाना बना सके और उनकी देखभाल करने के लिए चिकित्सा का  ज्ञान रखे । डॉ॰ शारदा कबीर ने शादी के बाद सविता आम्बेडकर नाम अपनाया और उनके बाकी जीवन में उनकी देखभाल की। सविता आम्बेडकर, जिन्हें ‘माई’ या ‘माइसाहेब’ कहा जाता था, का 29 मई 2003 को नई दिल्ली के मेहरौली में 93 वर्ष की आयु में निधन हो गया।

 धर्म में परिवर्तन

आंबेडकर 10-12 साल हिन्दू धर्म के अन्तर्गत रहे तथा हिन्दू में रहते  हुए बाबासाहब आम्बेडकर ने हिन्दू धर्म तथा हिन्दु समाज को सुधारने, समता तथा सम्मान प्राप्त करने के लिए तमाम प्रयत्न किए, परन्तु सवर्ण हिन्दुओं का ह्रदय परिवर्तन न हुआ।उन्हें यह लगता था कि हिन्दू धर्म में समानता के लिए कोई स्थान नहीं है।

” हिन्दू समाज का यह कहना था कि “मनुष्य धर्म के लिए हैं” जबकि आम्बेडकर का यह मत था कि “धर्म मनुष्य के लिए हैं।” आम्बेडकर ने कहा कि ऐसे धर्म का कोई मतलब नहीं जिसमें मनुष्यता का कुछ भी मूल्य नहीं। जो अपने ही धर्म के अनुयायिओं (अछूतों को) को धर्म शिक्षा प्राप्त नहीं करने देता, नौकरी करने में बाधा पहुँचाता है, बात-बात पर अपमानित करता है , भेदभाव को सही ठहरता है और यहाँ तक कि पानी तक नहीं मिलने देता ऐसे धर्म में रहने का कोई मतलब नहीं। आम्बेडकर ने हिन्दू धर्म त्यागने की घोषणा किसी भी प्रकार की दुश्मनी व हिन्दू धर्म के विनाश के लिए नहीं की थी बल्कि उन्होंने इसका फैसला कुछ मौलिक सिद्धांतों को लेकर किया जिनका हिन्दू धर्म में बिल्कुल तालमेल नहीं था।13 अक्टूबर 1935 को नासिक के निकट येवला में एक सम्मेलन में बोलते हुए आम्बेडकर ने धर्म परिवर्तन करने की घोषणा की,”हालांकि मैं एक अछूत हिन्दू के रूप में पैदा हुआ हूँ, लेकिन मैं एक हिन्दू के रूप में हरगिज नहीं मरूँगा!”

बौद्ध धर्म की ओर

भीमराव आंबेडकर सन् 1950 के दशक में  बौद्ध धर्म के प्रति आकर्षित हुए और बौद्ध भिक्षुओं व विद्वानों के एक सम्मेलन में भाग लेने के लिए श्रीलंका (तब सिलोन) गये। पुणे के पास एक नया बौद्ध विहार को समर्पित करते हुए, डॉ॰ आम्बेडकर ने घोषणा की कि वे बौद्ध धर्म पर एक पुस्तक लिख रहे हैं और जैसे ही यह समाप्त होगी वो औपचारिक रूप से बौद्ध धर्म अपना लेंगे। 1954 में आम्बेडकर ने म्यानमार का दो बार दौरा किया; दूसरी बार वो रंगून मे तीसरे विश्व बौद्ध फैलोशिप के सम्मेलन में भाग लेने के लिए गये। 1955 में उन्होंने ‘भारतीय बौद्ध महासभा’ यानी ‘बुद्धिस्ट सोसाइटी ऑफ इंडिया’ की स्थापना की। उन्होंने अपने अंतिम प्रसिद्ध ग्रंथ, ‘द बुद्ध एंड हिज़ धम्म’ को 1956 में पूरा किया। यह उनकी मृत्यु के पश्चात सन 1957 में प्रकाशित हुआ। इस ग्रंथ की प्रस्तावना में आम्बेडकर ने लिखा हैं कि “मैं भगवान बुद्ध और उनके मूल धर्म की शरण जा रहा हूँ”। मैं प्रचलित बौद्ध पन्थों से तटस्थ हूँ। मैं जिस बौद्ध धर्म को स्वीकार कर रहा हूँ, वह नव बौद्ध धर्म या नवयान हैं। 14 अक्टूबर 1956 को नागपुर शहर में डॉ॰ भीमराव आम्बेडकर ने खुद और उनके समर्थकों के लिए एक औपचारिक सार्वजनिक धर्मांतरण समारोह का आयोजन किया। प्रथम डॉ॰ आम्बेडकर ने अपनी पत्नी सविता एवं कुछ सहयोगियों के साथ भिक्षु महास्थवीर चंद्रमणी द्वारा पारंपरिक तरीके से त्रिरत्न और पंचशील को अपनाते हुये बौद्ध धर्म ग्रहण किया।

निधन

आंबेडकर जी 1948 से, मधुमेह से पीड़ित थे। जून से अक्टूबर 1954 तक वो बहुत बीमार रहे इस दौरान वो कमजोर होती दृष्टि से ग्रस्त थे। राजनीतिक मुद्दों से परेशान आम्बेडकर का स्वास्थ्य दिन प्रतिदिन बद से बदतर होता चला गया। और 1955 तक उनके द्वारा किये गये लगातार काम ने उनके शरीर को तोड़ कर रख दिया। अपनी अंतिम पांडुलिपि भगवान बुद्ध और उनका धम्म को पूरा करने के तीन दिन के बाद 6 दिसम्बर 1956 को आम्बेडकर का महापरिनिर्वाण नींद में दिल्ली में उनके घर मे हो गया। तब उनकी आयु 64 वर्ष एवं 7 महिने की थी।


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