सही दिशा ही सही दशा, बेस्ट निरंकारी विचार

निरंकारी विचार || nirankri hindi vichar

धन निरंकारी जी 

निरंकारी विचार || nirankri hindi vichar
निरंकारी विचार || nirankri hindi vichar

1- हर यात्रा का पहला कदम एक ही होता है यदि पहला कदम सही दिशा की और बढे तो हर कदम मंजिल की ओर ले जाता है। जीवन की यात्रा को भी सही दिशा को पह्चानना है, सद्गुरु के नक़्शे-कदम पर चलना ही सही दिशा को पहचानना एवं अपनाना है ।

2- सद्गुरु ही सच्चा धर्म बना सकता है अपने ह्रदय में प्यार दर्द करुना दया नम्रता एवं भाईचारे की भावनाओ को सदैव बनाये रखना , धर्मी बन्ने की ओर बढ़ना है ।

3- प्रभु – प्रेम उन्ही को मिलता है जो प्रभु के बन्दों से प्रेम करते हैं मानवता से प्यार करके ही सच्चा धर्मी बना जा सकता है ।

4- गुरु की मत के द्वारा काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार पर आत्मा का नियंत्रण रखना है मन को आत्मा के अधीन करने से भावनाएं शुद्ध व सकारात्मक बन जाती हैं और कदम सही दिशा की ओर बढने लगते हैं।

5- गुरमत को अपनाकर जीवन को विशालता प्राप्त होती है इसलिए सद्भावना की सीमा कुछ गिने-चुने  लोगो तक सीमित न रहे बल्कि मानव समाज तक फैलानी चाहिए सबके  भले की कामना करने वाले का भला स्वतः ही हो जाता है ।

6- मन की इच्छाओ की पूर्ति में संतुष्टि नहीं, एक इच्चा की पूर्ति दूसरी इच्छा को जन्म दे देती है इसलिए न ही इच्छाओ का अंत होता है और न ही संतुष्टि का अहसास हो पाता  है। हमारी भलाई इसी में है की हम अपनी इच्छा को प्रभु इच्छा में विलीन करके अपने जीवन को आनंदमई बना लें ।

7- ब्रह्मज्ञान लेने के पश्चात् जब  हम गुरमत के मार्ग पर चलते हैं तो विरोध करने वाले हमरे भक्ति मार्ग में बाधाएं डाल सकते हैं, परन्तु हमने विचलित नहीं होना है क्योंकि हमारे साथ हमारा प्रभु है ।

बाबा हरदेव सिंह जी की बायोग्राफी 

8- भक्ति व सद्कर्मो की रेखा को सदैव लम्बी करते रहना ही दुसरो के अवगुणों को देखकर उन्हें स्थान-स्थान पर लज्जित करना कीचड में कंकड़ फेंकने के सामान है। ऐसा करने से हम अपनी भक्ति की रेखा को छोटा कर रहे होते हैं ।दुसरो का जो कर्म हमें अच्छा नहीं लगता, हम उस कर्म से स्वयं तौबा करें और उनके लिए भी प्रार्थना करें कि प्रभू  उन्हें सुमति दें ।

9- जब मैं (अहंकार) ने निरंकार की शरण ले ली तो इसके साथ जुडी शेष भावनाएंम, काम, क्रोध, लोभ, मोह, एवं अहंकार को भी सही दिशा मिल जाती है, कामन स्वार्थ रहित होकर परोपकारी बन जाती है, तथा लोभ मोह केवल धन-दौलत, संपत्ति-पदवी एवं सांसारिक प्राप्तियो तक सीमित न रहकर सेवा, सत्संग,सुमिरन की संपत्ति संचित करने में लग जाती है ।

10- मंमुखो की कुसंगति हमें गुमराह कर सकती है, हमारे अंदर के सोये हुए शैतान को जगा सकती है। हमें बुरे कर्मो की और धकेल सकती है इसलिए ऐसी प्रवृति वाले लोगो से दूर रहना भक्ति की कमी को बचाना है ।

11- यदि  काम, क्रोध, लोभ, मोह, मन पर आक्रमण करे तो निरंकार के सुमिरन द्वारा इन प्रवृतियों को सही दिशा मिल जाती है । सेवा सुनिरन सत्संग   का लोभ एवं कामना, सभी से प्रेम, सद्गुरु व संतो पर मान तथा अपनी कम्जोरियो व गलतियों को सम्मुख  रखने से इन भावनाओ को दिशा मिल जाती है ।

…… comment below …..

विचार-राज-वासदेव सिंह

About kailash

मेरा नाम कैलाश रावत है और मैं hindish.com का एडमिन व लेखक हूँ और इस ब्लॉग पर निरंतर हिन्दी में ,टेक,टिप्स,जीवनियाँ,रहस्य,व अन्य जानकारी वाली पोस्ट share करता रहता हूँ, मेरा मकसद यह है की जैसे बाकि भाषाए इन्टरनेट पर अपनी एक अलग पह्चान बना रही हैं तो फिर हम भी अपनी मात्र भाषा की इन्टरनेट की दुनियां में अलग पहचान बनाये न की hinglish में ।
Share post, share knowledge

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *