आध्यात्मिक सदगुरु और शिष्य

Spirituality

आजकल भारत में धर्म के नाम पर अन्धविश्वास करने वाले लोग लुट जाते हैं। और अपनी परेशानी लेकर किसी ढोंगी के पास जाते हैं क्या आपको लगता है की आपके अलावा कोई आपकी चिन्ता कर सकत है जबतक आप खुद अपनी समस्या का हल नहीं निकालेंगे वह नहीं निकलेगा आध्यात्म के नाम से आजकल हमारे देश में बहुत पैसो की वसूली की जा रही है जबकि अध्यात्म का पैसो से कोई लेना देना नहीं किसी भी आद्यात्मिक सद्गुरु के पास जाने से पहले जरा निम्नलिखित तथ्यों पर गौर की एक शिष्य और गुरु के बीच क्या रिश्ता होता है  ।

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  1. गुरु और शिष्य का रिश्ता आत्मिक है ,शारीरिक नहीं यह रिश्ता देश,काल और समय की सीमा से उपर होता है शरीर का सफ़र संपन्न होने के पश्चात भी यह रिश्ता कायम रहता है ।
  2. शरीर छोड़ने के पश्चात गुरु ही हरी की दरगाह में अपने गुरसिख की गवाही देता है उसकी आत्मा को निरंकार में विलीन करता है जन्म मरण के चक्कर से बचाता है ।
  3. गुरु अपने शिष्यों को अपने परिवार से भी अधिक प्रेम करता है आवश्यकता पड़े तो शिष्यों के लिए परिवार का हित भी कुर्बान कर देता है ।
  4. गुरसिख के जीवन में भी गुरु ही सर्वोपरि होता है वह सदा सत्य का साथ देता है आवश्यकता पड़े तो गुरु का वचन मानते हुए गुरसिख भी अपनी जान तक की बाजी लगा देता है यह रिश्ता अनुपम है ।
  5. गुरुसिख (शिष्य) कभी किसी की मजबूरी का फायदा नहीं उठाता है बल्कि उसकी मजबूरी में सहायक बनता है,सांत्वना देकर उसे  हालत में लड़ना सिखाता है और उसे अपने सद्गुरु की कृपा पर विश्वाश दृढ करने के इए प्रेरक बनता है ।
  6. यूँ तो जंगल में अनेक पेड़ पौधे लगे होते हैं परन्तु एक चिकित्सक उनमे से लाभदायक पौधे को दवाई के रूप में इस्तेमाल कर लेता है इसी प्रकार ज्ञान लेने वाले तो अनेक गुरुसिख होते हैं परन्तु समर्पित गुर्सिखो को चुनकर सद्गुरु परोपकार एवं जिम्मेदारी के कार्य करवा लेता है ।

क्या है प्रार्थना आप करते तो हैं पर जानते नहीं जाने

  1. गुरु के घर द्वेत एवं भेद-भाव का नमो निशान नहीं होता सभी गुरु से प्रेम में बंधे हुए एक हो जाते हैं सब एक-दुसरे को नमन करते हैं यहाँ अनपढ़ विद्वान और छोटे-बड़े पूज्यनीय हैं इनकी नमस्कार शरीर को नहीं आत्मा (जो अपने मालिक परमात्मा से मिलकर प्रकाश्मय्य हो चुकी होती है )उसको होती है एक गुरसिख दुसरे गुरसिख के चरण छू कर सद्गुरु की रहमत को ही ले रहा होता है ।
  2. सद्गुरु की बक्शिश  पल पल बरसती है यह एक शिष्य पर निर्भर करता है कि वह इस बक्शिश को कितना और कैसे संभालता है केवल संकट के समय ही गुरु को याद करता है या गुरु उसके ह्रदय में इस प्रकार बीएस गया है की जैसे शरीर में श्वास-क्रिया जो गुरुसिख हर क्षण गुरु का ध्यान व धन्यवाद करता है वह क्षण क्षण इस बक्सिश को संभल रहा होता है ।
  3. ज्यो-ज्यो गुरुसिख अपने सद्गुरु एवं प्रभु के साथ एकसुर होता है त्यों-त्यों इसके रहस्य को समझने लगता है वह जानने लगता है कि उसका सद्गुरु उससे क्या चाहता है अपने सद्गुरु-निरंकार के ध्यानानुसार कार्य करने से वह सब कुछ पा लेता है जो न ही उसके भाग्य में होता है और न ही वह उसका पात्र ।
  4. गुरसिख की सदैव यही कामना रहती है कि उसके किसी कर्म,वचन,व्यवहार,से उसका सद्गुरु न रूठे संसार के रूठ जाने पर तो गुरु संभाल लेता है परन्तु गुरु के रूठ जाने का ध्यान भी भय की कालिमा से मन को घेर लेता है हर गुरसिख की प्रार्थना यही होती है की ऐसा समय कभी उसके जीवन में न आये दातार की कृपा दृष्टि पर बनी रहे  जो गुरसिख जीवन के अंतिम क्षण तक सद्गुरु एवं निरंकार से जुड़े रहते हैं उन्हें मृत्यु से दर नहीं लगता क्योंकि अंतिम समय में यम्दूत नहीं बल्कि सद्गुरु या कोई महापुरुष ही उन्हें दिखाई देता है और उनकी आत्मा शरीर में से निकल जाती है जैसे की माखन में से बाल ।
  5. जैसी गुरुसिख की भावना होती है वैसा ही सद्गुरु का रूप उसको नज़र आता है जो गुरसिख क्षण-क्षण  गुरु को ध्यान में बसाये रखता है वह क्षण क्षण गुरु की रहमत के सागर में दुबकी लगाकर आनंद के भण्डार भर लेता है ।
  6. जो संकट के समय जल्द ही याद करता है वह सद्गुरु के दया सागर में कभी कभी डूबता है और जो गुरु को बिलकुल याद नहीं करता अपने बलबूते पर सफलता हासिल करना चाहता है वह इस रहमत के सागर से बिलकुल अनजान है ।
  7. ज्ञान तब तक शिष्य के ह्रदय में टिकता है जब तक शिष्य अपने सद्गुरु को ह्रदय में बसाये रखता है यदि कोई कहे की मैं न तो सद्गुरु को मानता हूँ न ही संगत को ,मैं केवल निरंकार को मानता हूँ तो समझ लेना चाहिए की उसके मन में निरंकार नहीं ,अहंकार बसा हुआ है ।

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मेरा नाम कैलाश रावत है और मैं hindish.com का एडमिन व लेखक हूँ और इस ब्लॉग पर निरंतर हिन्दी में ,टेक,टिप्स,जीवनियाँ,रहस्य,व अन्य जानकारी वाली पोस्ट share करता रहता हूँ, मेरा मकसद यह है की जैसे बाकि भाषाए इन्टरनेट पर अपनी एक अलग पह्चान बना रही हैं तो फिर हम भी अपनी मात्र भाषा की इन्टरनेट की दुनियां में अलग पहचान बनाये न की hinglish में ।
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